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बध्वान/बधौन पुजाई क्या होती है, यह उत्तराखंड मे किसके लिए मनाया जाता है और क्यों??
बध्वान पूजन कृषक- पशुचारक वर्ग के कुमाऊंनी समाज का एक विशेष उत्सव होता है। उल्लेख्य है कि कृषक पशुचारक समाज में पशुओं का महत्व मानवों से कम नहीं होता। मानवों के समान ही वह उनके सन्दर्भ में भी अनेक पर्वोत्सवों व आनुष्ठानिक उत्सवों का समय-समय पर आयोजन करता रहता है। उनसे सम्बद्ध आनुष्ठानिक उत्सवों में बध्वान देवता का पूजन विशेष महत्व रखता है।
यहां एक प्रकार से पशुओं का नामकरण संस्कार होता है। इसमें नवप्रसूत पशु के प्रसवाशौचकालीन दुग्ध की परिशुद्धि के लिए तथा नवजात वत्स का नामकरण करने के लिए एक आनुष्ठानिक आयोजन किया जाता है। इस काल में घर के किसी पशु का दूध, अशौच के कारण, किसी देवता को अर्पित नहीं किया जाता है। डङरिया (लोक देवताओं के माध्यम) लोग गाय के दूध का दस दिन तक व भैंस के दूध का तीन दिन तक परिहार करते हैं।
बध्वान पूजा का अपना एक विशिष्ट विधान होता है। पशुओं को बांधने के स्थान गोठ या खरक में उस दिन सभी पशुओं के सारे दूध को एकत्र करके खीर तथा पिछले दो चार दिन के दही की मलाई को बिलोकर निकाले गये मक्खन से बनाये गये घी के पुए पकाये जाते हैं। और वहां पर बछड़ों को बांधने के स्थान पर किसी चपटे पटाल पर या तिमिल (पहाड़ी अंजीर) के पत्तों से बने पत्तल पर प्रसूता पशु के गोबर के एक द्विखण्डी वर्तुलाकार कुंड बनाया जाता है जिसे स्थानीय बोली में 'भराड़ी' कहा जाता है। मध्य में गोबर की भित्ति से विभक्त इसके दोनों भागों को उस पशु के उस दिन के दूध से पूरित कर दिया जाता है। उसे विभिन्न कोणों तथा मध्य में तिमिल की कोपलों को गाड़ कर उनके ऊपर ताजा नवनीत रखा जाता है और फिर उसे (भराड़ी को) त्रिगुणात्मक कच्चे धागे से तीन बार अवेष्टित किया जाता है। वहां खीर-पुओं का प्रसाद रख कर फूल-पत्तियों, विशेषकर पाती नामक पौधों की पत्तियों से, बध्वान देवता का पूजन-आराधन व नीराजन किया जाता है। जलते अंगारों पर नवनीत की धूप दी जाती है तथा नवजात वत्स/कटिया को कच्ची हल्दी का तिलक करके उसके अगले पैरों से उपर्युक्त भराड़ी को कुचलवाने के साथ-साथ उसके लिए चुने गये नाम को घोषित किया जाता है। फिर उसकी मां को भी टीका किया जाता है और कहा जाता है- 'तू अब तक लैणी थी अब बाखड़ी (वयष्किली) हो गयी है। 'उस दिन तक उसके दूध का किसी अन्य पशु के दूध के साथ मिश्रण नहीं किया जाता और इसके बाद छूट हो जाती है। इस मिश्रित दुग्ध से निकाले गये प्रथम बार के नवनीत को बध्वान देवता को, उसके निमित्त स्थापित स्थान में अर्पित किया जाता है।
इस संदर्भ में यह भी उल्लेख्य है कि गढ़वाल में भी 'नागर्जा' अथवा 'बालणदेवता' के नाम से जो पूजा की जाती है वह भी इसकी प्रतिरूप मात्र ही है। वहाँ की पशुपालकीय/ पशुचारकीय परम्परा के अनुसार जबकिसी घर में छानी या खरक में किसी पशु (गाय-भैंस) का प्रसव होता है तो स्वयं उसके दूध का प्रयोग करने से पूर्व उसे नागराजा को अर्पित किया जाता है। एतदर्थ गांव के निकट किसी जलाशय के समीप किसी पर्वतीय ढाल की ओट में नागराजा के 'थान' (स्थान, देवस्थल) की स्थापना की जाती है। इस स्थान पर प्रसूता पशु के गोबर से एक कुंड की रचना की जाती है तथा उसे उक्त पशु के दुग्ध से पूरित किया जाता है तथा धूप-दीप आदि से उसकी पूजा की जाती है और रोट का प्रसाद चढ़ाया जाता है और नागराजा से पशु के स्वस्थ, सुरक्षित एवं दुधारू होने की प्रार्थना की जाती है। इस संदर्भ में इसे 'बालण' (-बध्वान) देवता भी कहा जाता है। यह पर्वतीय पशुचारक संस्कृति का एक सार्वभौम अनुष्ठान है इसकी पुष्टि अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी इसके अनुपालन से होती है। उदाहरणार्थ- डुग्गर प्रदेश (जम्मू) में रावी के तटवर्तीय क्षेत्रों में गाय-भैंस के प्रसव का अशौचकाल इक्कीस दिन तक माना जाता है। इसके बाद भी उसे तब तक शुद्ध नहीं माना जाता तब तक कि गोह्र्दन (गोधन=बध्वान) देवता का पूजन नहीं कर लिया जाता है। इसके अनुष्ठान के लिए उस पशु के गोबर का एक स्तूप बनाकर उसके पास उसके दुग्ध से निकाले गये घी की धूप देकर उसका पूजन किया जाता है।
