रम्माण पूर्ण जानकारी सहित
अंतिम दिन लोकशैली में रामायण के कुछ चुनिंदा प्रसंगों को प्रस्तुत किया जाता है । रामायण की प्रस्तुति के कारण यह सम्पूर्ण आयोजन रम्माण के नाम से जाना जाता है । इन प्रसंगों के साथ बीच - बीच में पौराणिक , ऐतिहासिक एवं मिथकीय चरित्रों तथा घटनाओं को मुखौटा शैली के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता नृत्य है । इसे देखने के लिए क्षेत्र में दूर-दूर से लोग आते हैं और मेला जुड़ जाता है.
इस आयोजन की शुरूआत बैसाख की संक्रान्ति ( बैसाखी ) से मानी जा सकती है । बैसाख की संक्रांति के तीन दिन पहले से भूम्याल देवता की पूजा शुरू हो जाती है । भुम्याल देवता मंदिर के बजाय परिवारों में रहते हैं । एक परिवार में एक साल की अवधि तक भूम्याल को रखा जाता है तथा सालभर पूजा की जिम्मेदारी उसी परिवार की होती है । बैसाखी से पूर्व तीन दिन की पूजा इसी परिवार में सम्पन्न होती है । बैसाख की संक्रांति को पूरे गाँव वालों का सहभोज होता है तथा उस परिवार से भूम्याल देवता को बाहर निकाला जाता है । 11 फीट लम्बे बाँस के डण्डे के सिरोभाग पर भुम्याल देवता की चाँदी की मूर्ति को स्थापित किया जाता है । मूर्ति के पीछे चौर मुट्ठ ( चंवर गाय के पूंछ के बालों का गुच्छा ) लगा होता है । लम्बे लट्ठे पर ऊपर से नीचे तक रंग - बिरंगे रेशमी साफे बँधे होते हैं । इस प्रकार भुम्याल देवता का उत्सव रूप या नृत्य रूप तैयार कर दिया जाता है । इस उत्सव रूप को भूम्याल का ' लवोटू ' कहते हैं ।
इस ' लवोटू ' को गांव के जो लोग नचाते हैं उन्हें धारी ( धारण करने वाला ) कहा जाता है । धारी भूम्याल के लवोटू को अपने कंधे के सहारे खड़ा कर नाचते हैं । धारी लोग नचाते हुए भूम्याल के लवोटू का उस घर से मंदिर में ले जाते हैं । विखोत के दिन से रम्माण के आयोजन तक भुम्याल देवता की मंदिर में ही पंचायती पूजा होती है । इसी दिनपंच - पुरोहित मुख्य आयोजन रम्माण की तिथि तय करते हैं । यह तिथि प्राय : बैसाखी के दिन से 9 वें से 13 वें दिनों के बीच किसी दिन निर्धारित होती है । अपरिहार्य परिस्थितियों में और आगे भी बढ़ाई जा सकती है । इसी दिन भुम्याल देवता से रम्माण के सफल आयोजन तथा गाँव की ऋद्धि - सिद्धि की कामना की जाती है । बैसाखी के दूसरे दिन अर्थात 2 गते बैसाख को मनाई जाती है , इसे ' बिसूका ' कहते हैं ।
भूम्याल देवता का ग्राम भ्रमण
तीसरे दिन अर्थात 3 गते बैसाख से दिन में भूम्याल देवता भ्रमण पर जाता है । देवता का ग्राम भ्रमण कार्यक्रम पंचों द्वारा पहले से तय हो जाता है । ग्राम भ्रमण के दौरान देवता अनिवार्य रूप से प्रत्येक परिवार के खौले ( आंगन ) में जाता है तथा पूजा ग्रहण करता है । इसके बाद भूम्याल आसपास के ग्राम - क्षेत्र में भ्रमण पर जाता है । विभिन्न देवी देवताओं से भी भेंट करता है । भूम्याल का यह ग्रामक्षेत्र भ्रमण पांच - छै दिन में पूरा होता है ।
रात्रि के कार्यक्रम
बैसाख के तीसरे दिन की रात्रि से लेकर रम्माण आयोजन की तिथि तक हर रात्रि को भूम्याल देवता के मंदिर प्रांगण में मुखौटे पहन कर नृत्य किया जाता है । इन मुखौटों को पत्तर कहते हैं और मुखौटा पहन कर नृत्य किये जाने को पत्तर लगना कहा जाता है । ' पत्तर ' शब्द को पात्र , किरदार के अर्थों में भी प्रयुक्त किया जाता है । ये पत्तर केमू ( जंगली शहतूत ) की लकड़ी पर कलात्मक तरीके से उत्कीर्ण किये गये मुखौटे होते हैं । ये विभिन्न पौराणिक , ऐतिहासिक तथा काल्पनिक चरित्रों के होते हैं । स्थानीय तौर पर इन पत्तरों को दो रूपों में जाना जाता है । ' द्यो पत्तर ' तथा ' ख्यलारी पत्तर ' । ' द्यो पत्तर ' देवता से संबंधित चरित्र और मुखौटे होते हैं और ख्यालारी पत्तर मनोरंजक चरित्र और मुखौटे होते कुछ परम्परागत मनोरंजक कार्यक्रम भी दिखाये जाते हैं और कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी सम्पन्न होते हैं ।
इस क्रम में सबसे पहले ' सूर्ज पत्तर ' ( सूर्य का मुखौटा ) आता है । यह विशेष रूप से सजाया जाता है । इसी रात कालिंग और गणेश पत्तर भी आते हैं । चार गते राणि राधिका नृत्य होता है । यह नृत्य कृष्ण और राधिकाओं ( गोपियों ) का माना जाता है । पहली रात्रि कृष्ण के साथ तीन राधिका , अगली रात्रि को पाँच और फिर सात राधिकाएं नाचती हैं । इसी के साथ साथ अगली रात्रि से क्रमश : मोर - मोर्याण , ( महर और उसकी पत्नी ) , बण्या - बण्यांण - चोर , ( व्यापारी , उसकी पत्नी और चोर ) , बुड़देबा , राजा कन्न ( कानड़ा नरेश या कांगड़ा नरेश ) , ख्यालारी आदि पत्तर आते हैं । इन पत्तरों के आने का एक परम्परागत क्रम निर्धारित है । इन पत्तरों का क्रम अलग -2 भी होता है । किसी एक रात गोपीचंद नृत्य भी आयोजित किया जाता है ।
' स्यूर्त ' की रात
रम्माण की पूर्व रात्रि को ' स्यू ' होता है । स् का अर्थ है सम्पूर्ण रात्रि कार्यक्रम ' स्मृत ' की रात्रि को सभी पत्तर आते हैं और पाण्डव नृत्य भी होता है । इस रात्रि रम्माण के बाजे लगते हैं तथा इस पर रम्माणी नाचते हैं । इसमें अठारह साल से कम उम्र के बच्चे भी नाचते हैं जिन्हें दूसरे दिन आयोजित होने वाले मुख्य रम्माण मेले हेतु राम , लक्ष्मण , सीता और हनुमान के रूप में चयनित किया जाता है । इसी स्तृत की रात को मल्लों का भी चयन होता है । ढोल वादक अन्य लोगों के सहयोग से इनका चयन करते हैं तथा यही दूसरे दिन होने वाले रम्माण में पात्र के रूप में भूमिका निभाते हैं ।
कलाकरों का चयन
इसी सिर्त की रात को राम , लक्ष्मण , सीता , हनुमान के पात्रों का चयन होता है । इन पात्रों की उम्र 1 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए । सामाजिक रूप से कोई लाछन नहीं होना चाहिए । 4 मल्लों के पात्रों की प्रक्रिया भी नियमबद्ध है । 4 मल्लों में से एक कुवर जाति के लोगों से , एक डुंग्री गांव से और 2 सफेद माल डूंग्री और सलूड़ गांव से होते हैं। इसका चयन संबंधित जाति-गांव वाले खुद करते हैं ।
रम्माण का आयोजन
अंतिम दिन होता है रम्माण का आयोजन यह दिन में होने वाला आयोजन है । बड़ी संख्या में क्षेत्र के लोग रम्माण देखने आते हैं । आयोजन स्थल वही पंचायती चौक , भुम्याल देवता का मंदिर प्रांगण । इस दिन रामायण के कुछ चुनिंदा प्रसंगों को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है । ये प्रसंग है- राम लक्ष्मण जन्म , राम लक्ष्मण का जनकपुरी में भ्रमण , सीता स्वयंबर , राम वनवास , स्वर्णमृग वध , सीता हरण , हनुमान मिलन , लंका दहन तथा राजतिलक रामायण के इन प्रसंगों का प्रस्तुतिकरण सिर्फ नृत्य के द्वारा किया जाता है । यह नृत्य ढोल के तालों पर होता है । सर्वप्रथम राम - लक्ष्मण मंदिर प्रांगण में आकर नृत्य करते हैं । यह नृत्य पाँच तालों में किया जाता है ।
प्रत्येक नृत्य प्रस्तुति के बाद रामायण के पात्र विश्राम करते हैं । इसी बीच अन्य पौराणिक , ऐतिहासिक और मिथकीय पात्र आकर अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं । ये पात्र हैं- म्वौर म्वार्याण , वण्यां - बण्यांण - चोर , बाघ , माल ( मल्ल ) कुरज्वोगी इत्यादि । बीच बीच में भुम्याल देवता का ' लवोटू ' भी नचाया जाता है ।
ऐतिहासिक पत्तरों में बण्यां - बण्यांण तथा माल विशेष आकर्षण के केन्द्र होते हैं । बण्यां - बण्यांण के बारे में कहा जाता है कि ये तिब्बत के व्यापारी थे जो कि गाँवों में ऊन बेचने आते थे । एकबार उनके पीछे चोर लगे और उनका पैसा और माल लूट कर ले गये । इस किस्से को नृत्य के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है । माल पत्तर गोरख्यणी के समय ( सन् 1804-14 ) स्थानीय योद्धाओं के द्वारा गोरखों से युद्ध की घटना प्रस्तुत करते हैं । इनमें दो माल ( मल्ला ) काले होते हैं और दो सफेद होते हैं । काले स्थानीय हैं और सफेद मल्ल गोरख । इस नृत्य के समय प्रयुक्त की जाने वाली एक तलवार और ढाल गोरखों से छीनी गयी बतायी जाती है । दोनों पक्षों में एक एक माल के पास बारूद भरी बंदूक भी होती है । इसके अलावा खुंखरी , ढाल , तलवार को हाथ में लिये माल नाचते हुए चुनौती , वीरता , बल प्रदर्शन की अभिव्यक्ति करते हैं । अंत में बदूकों की हवाई फायर के साथ दुश्मन पर विजय का ऐलान करते हुए यह नृत्य समाप्त होता है ।
इसके बाद ' कुरू जोत्री ' आता है । यह फटे तथा गंदे कपड़े पहने होता है । इसके सारे कपड़ों पर ' कुरू ' ( एक प्रकार का काँटेदार कपड़ों पर चिपकने वाला फूल ) लगा होता है । ' कुरू जोत्री ' एकाएक रम्वांण देखने में डूबी भीड़ के बीच घुस जाता है । उसके घुसते ही लोग ' कूरू ' चिपकने के भय से इधर - उधर भागते हैं कुरू त्वोगी ' कूरू ' लगे एक कपड़े से सबको खदेड़ता है । जिनके कपड़ों पर कुरू चिपक जाता है वे उसे निकाल -2 दूसरों पर फेंकते हैं । थोड़ी ही देर में कुरू जोत्री ' का शरीर कूरू का चलता - फिरता गोदाम बन जाता है । उसके कपड़ों से ' कूरू ' निकाल - निकाल कर लोग दूसरों पर फेंकते हैं । हँसी - ठिठोली और मारने - बचने में तल्लीन लोग तब ही सामान्य स्थिति में आते हैं जबकि ' नरसिंह ' आकर नाचना शुरू कर देते हैं ।
यह अंतिम प्रस्तुति होती है । नरसिंह पत्तर इनसे सम्बन्धित पौराणिक कथा को अभिव्यक्त करते हैं । प्रह्लाद का एक पुतला बनाकर आयोजन स्थल के एक कोने में रखा जाता है । नरसिंह पत्तर नृत्य करते प्रह्लाद के पुतले को उठा लेता है । इसके बाद नरसिंह अंदर जाता है और भूमियाल का लवोटू बाहर आयोजन स्थल पर आता है । परम्परानुसार भूम्याल और नृसिंह को एक साथ मंदिर परिसर में नहीं लाया जाता है । नरसिंह का मुखौटा बाहर आता है तो भूम्याल का लवोटू मंदिर के भीतर रहता है । कुछ देर तक भूम्याल को नचाया जाता है । फिर भूम्याल नंदा और वीर का पश्वा भूम्याल के लवोटू का धरती के समानान्तर अपनी बाहों में लिटा कर चारों दिशाओं में' ख्यलाते ' हैं । तीनों देवता औतरते ( आदमी पर अवतार लेना ) हैं ओर अपने - अपने निसाण लेते ( अपने ऊपर सचमुच देवता अवतरित हुआ है यह साबित करने के लिये पश्वा लोगों द्वारा अपने पेट पर कटार भौंकना या पीठ पर तलवार मारना ) हैं । निसाण लेते समय समूचे जन - समूह में चुप्पी छा जाती है । इसके बाद अगर देवता तो प्रसन्नता व्यक्त करते हैं तथा सारे गाँव तथा प्रसन्न हुए दर्शकों को आशीष देते हैं । इस समय लोग अवतरित देवता से ' पूछ ' भी करवाते हैं । देवता की प्रसन्नता और अप्रसन्नता के ये क्षण पंचों के लिए आयोजन की सफलता और असफलता को जानने के क्षण होते हैं । यदि देवता प्रसन्नता व्यक्त करते हैं तो सारे ग्रामवासी इस कार्यक्रम से थके हारे अलौकिक आनंद को महसूस करते हैं । यही आनंद इस समूचे आयोजन का सुफल है । अंत में समस्त ग्रामवासी भूमियाल को उस परिवार तक पहुँचाने जाते हैं जिसकी अर्जी पंचायत ने मंजूर की होती है । उस आदमी के घर पर भुम्याल देवता एक साल तक रहता है तथा सालभर पूजने की जिम्मेदरी उसी परिवार की होती है । उस घर के आंगन में प्रसाद आदि बँटने के बाद इस समूचे आयोजन का समापन हो जाता है ।
रम्माण की पूरी प्रस्तुति में कोई संवाद नहीं होता है । ढोल के तालों में नृत्य के साथ भावों की अभिव्यक्ति की जाती है । राम लक्ष्मण और सीता 18 तालों में नाचते हैं । तालों का हिसाब मंदिर के द्वार पर धारियां खींचकर रखा जाता है ।
रम्माण गायन
रम्माण की इन प्रस्तुतियों में रम्माण गाने वालों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । इन्हें जागरिया और भल्ला कहा जाता है । ये लोकगायक नाचने वाले पात्रों से सम्बन्धित कथा और प्रसंगों को जागर शैली में गाते हैं । रामकथा को गढ़वाली भाषा में जागर शैली में प्रस्तुत किया जाता है । पहले सलूड़ - डुंगा में भलगांव के भल्ला रम्माण गायन करते थे । इन गायकों को निमंत्रण भेजाजाता था । पारिश्रमिक के रूप में उन्हें गांव की तरफ से भेंट भी दी जाती थी । लेकिन वर्तमान में रम्माण गायन की परम्परा समाप्त हो रही है ।
वाद्य यंत्र एवं वस्त्र परिधान
रम्माण के इस आयोजन में ढोल , दमाव , झांझर तथा मंजीरे का प्रयोग किया जाता है । वस्त्र परिधानों में घाघरा , चूड़ीदार पैजामा , रेशमी साफे , कमर बंद आदि प्रयुक्त होते हैं । काल्पनिक पात्र तथा विदूषक अपनी कल्पना के अनुसार हास्य उत्पन्न करने के लिए मेकअप करते हैं । छुट - पुट रूप से आधुनिक सौन्दर्य प्रसाधनों का भी प्रयोग किया जाता है । मेकअप तथा वस्त्र परिधानों में ठेठ स्थानीयता होती है । आधुनिकता और बनावटीपन कम । सादगी तथा सरलता इन प्रस्तुतियों की खूबसूरती है ।
आर्थिकी
पखवाड़े भर चलने वाले इस आयोजन को आयोजित करने में ध्याणियों ( ब्याही गई बेटियों ) , रिश्तेदारों और मेहमानों के भोजन इत्यादि के अलावा ग्रामवासियों का व्यक्तिगत रूप से कोई अन्य खर्चा नहीं होता है । इस आयोजन में ध्याणियों को विशेष रूप से आमन्त्रित किया जाता है । पंचायती खर्चे के रूप में जो थोड़ी - बहुत जरूरत होती है उसे चढ़ावे- भेंट से पूरा कर लिया जाता है । चढ़ावे - भेंट के रूप में धनराशि देने का रिवाज नहीं है । इसके बजाय स्थानीय खाद्य - च्यूड़े , चणा कॉणी , झंगोरे के बुखुणे , स्थानीय फल आदि चढ़ाने का ज्यादा प्रचलन है ।
परम्परागत व्यवस्थाएं
इस आयोजन की सम्पूर्ण व्यवस्था परम्परागत रूप से संचालित होती चली आ रही है । गाण्या और बारी प्रथा के माध्यम से यह कार्य सम्पन्न होते हैं । गाण्या परम्परागत पंचायत का मुखिया होता है । बारी पर कार्य सम्पादन की असल जिम्मेदारी होती है । प्रति वर्ष तीन - चार परिवारों को बारी का दायित्व सौंपा जाता है । बारी - बारी से ये जिम्मेदारी एक परिवार से दूसरे परिवार को सौंपी जाती है । रम्माण से पहले और बाद में पंचायत बैठती है । इसमें महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं ।
उपेक्षित थी यह सांस्कृतिक धरोहर
यूनेस्को द्वारा विश्व साँस्कृतिक धरोहर घोषित होने से पहले यह महत्वपूर्ण साँस्कृतिक धरोहर प्रायः उपेक्षित थी । यह आयोजन इस गाँव में विगत सैकड़ों वर्षों से हर साल आयोजित होता चला आ रहा है । गाँव वालों के लिए यह एक सिर्फ मनोरंजन न होकर अनिवार्य रूप से किया जाने वाला अनुष्ठान है । लेकिन इसकी ओर न मीडिया का कोई विशेष ध्यान गया और न ही सँस्कृतिकर्मी इसकी विशिष्ठता को पहचान सके । इस साँस्कृतिक धरोहर की खबर पहली बार सन् 1991-92 के आसपास प्रकाश पुरोहित जयदीप ने अमर उजाला में दी थी लेकिन बाद के वर्षों मे प्रिंटमीडिया में इस बारे में अधिक कुछ नहीं छपा । गढ़वाल वि ० वि ० में अंग्रेजी विभाग में प्रो ० डॉ ० डी ० आर ० पुरोहित ने 1992 में रम्माण को अपनी थीसिस के एक अध्याय के रूप में शामिल कर उस पर अनुसंधान किया और अकादमिक दुनिया को रम्माण से परिचित कराने का काम करते रहे । 1996 में इन पंक्तियों के लेखक द्वारा लिखा गया रम्माण पर फीचर नवभारत टाइम्स में छपा और इसी वर्ष देहरादून से प्रकाशित स्मारिका पर्वतीय संस्कृति परिषद् में तीन पन्नों का लेख फोटो के साथ छपा । इसके अलावा यह विशिष्ट आयोजन प्राय : अचर्चित ही रहा ।
यूनेस्को द्वारा सांस्कृतिक धरोहर घोषित होने का सफर
वर्ष 2008 में रम्माण को प्रदर्शन हेतु दिल्ली में आमंत्रित किए जाने के कारण संस्कृति कर्मियों का ध्यान इसकी ओर खिंचा इन्दिरा गाँधी नेशनल सेन्टर फॉर आर्ट्स ( आई . जी . एन.सी.ए. ) नई दिल्ली ने मार्च 2008 में रामकथा पर एक बड़ा सम्मेलन किया । जिसका विषय था ' रामायण अंकन , मंचन और वाचन ' । इसमें देश विदेश से रामायण पर काम करने वाले 50 लोग आए थे । इस आयोजन में इण्डोनेशिया , थाईलैंण्ड , बाली और भारत में पौड़ी , अल्मोड़ा , मथुरा सहित देश के विभिन्न हिस्सों में दिखाई जाने वाली रामायणों / रामलीलाओं को प्रस्तुत करने वाले दल भी पहुँचे थे । दिन में रामायण पर शोध पत्र प्रस्तुत किए जाते और शाम को ये दल अपनी प्रस्तुति देते ।
इसमें गढ़वाल वि.वि. से डॉ . डी . आर . पुरोहित एवं इतिहास के प्रो ० डी.पी. सकलानी को भी आमंत्रित किया गया था । डॉ . डी.आर. पुरोहित के प्रयासों से ही इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन में सलूड़ की रम्माण भी आमन्त्रित की गई । इक्कीस सदस्यों वाली रम्माण यह टीम सलूड़ गाँव के ही डॉ . के . एस . भण्डारी के नेतृत्व में दिल्ली गई और वहाँ पर देश दुनिया की विभिन्न रामायणों के बीच उत्तराखण्ड की रम्माण को प्रस्तुत किया गया । सलूड़ गाँव में मंदिर प्रांगण में दिखाये जाने वाले रम्माण को दिल्ली के थियेटर में दिखाने के लिए डॉ ० डी ० आर ० पुरोहित ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया । इस दरम्यान दो - तीन दिन दिल्ली में ही कलाकारों को प्रशिक्षित कर डॉ ० पुरोहित ने रम्माण की मंचीय प्रस्तुति तैयार करायी । सवा घण्टे तक चली सलूड़ की रम्माण की प्रस्तुति को रामायण पर कार्य करने वाले अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के विद्धानों की सराहना मिली । आई ० जी ० एन ० सी ० ए ० के मेम्बर सेकेट्री डॉ ० के ० के ० चक्रवर्ती और अमेरिका की रामकथा मर्मज्ञ पॉउला रिचमैन को सलूड़ की ये रम्माण देश - दुनिया की प्रस्तुतियों के बीच सर्वाधिक पसन्द आयी । पाँडला रिचमैन ने आई . जी . एन.सी.ए. को सलूड़ की रम्माण को यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल करने का सुझाव दिया ।
इसके एक महीने बाद अप्रैल 2008 में आई जी . एन.सी.ए. के पैंतीस लोगों की टीम ने सलूड गाँव पहुँच कर चार दिन तक पूरी रम्माण का अभिलेखीकरण किया । पौड़ी से आये फोटोग्राफर अरविंद मुगिल ने भी इस दौरान रम्माण को शूट किया । इसके बाद अक्टूबर 2008 को आई जी . एन.सी.ए. ने दिल्ली में कौथीग मेले का आयोजन किया । इसमें रम्माण की पूरी टीम को आमंत्रित किया गया । डॉ . के.एस. भण्डारी के नेतृत्व में चार जोड़ी ढोल-दमाउ, भूम्याल के ' बर्मठांग ' सहित उनचालीस लोगों की टीम दिल्ली पहुँची । पूरी टीम 15 दिन दिल्ली में रही । वहाँ रह कर टीम ने दिल्ली के परिवेश में परिसर का निर्माण कराया । भूम्याल का मंदिर तथा चौक का निर्माण कराया ताकि कलाकार अपने वास्तविक परिवेश में रम्माण का प्रदर्शन कर सकें । रम्माण का प्रदर्शन किया गया । आई.जी.एन. सी . ए . यूनेस्को के लिए प्रस्ताव बनाने पर लगा रहा । 2008 में आई.जी. एन.सी.ए. ने जो अभिलेखीकरण किया था उसमें से रम्माण पर आधे घण्टे की फिल्म बना कर इस प्रस्ताव के साथ देनी थी लेकिन तकनीकी दिक्कतों के कारण आई.जी. एन.सी.ए. ऐसा नहीं कर पायी । ऐसे समय पर पौड़ी के पत्रकार / फोटोग्राफर की मदद ली गई । अरविंद मुगिल ने 27 मिनट की फिल्म बना कर दे दी । आई . जी.एन.सी.ए. ने ये फिल्म तथा अन्य जरूरी दस्तावेजों के साथ रम्माण को विश्वधरोहर बनाने संबंधी अपना प्रस्ताव यूनेस्को में जमा कर दिया । 2 अक्टूबर 2002 को यूनेस्को की आबुधाबी में होने वाली बैठक में रम्माण को विश्व धरोहर घोषित कर दिया । इस बैठक की अध्यक्षता जापान के मित्सुबिसी कर रहे थे । उस वर्ष भारत से एक मात्र रम्माण को ही अमूर्त सांस्कृतिक विश्व धरोहर घोषित किया गया था ।
इसके बाद तो सलूड़ - डुंग्रा का रम्माण चर्चा में आ गया । कई जगहों से इसके लिए आमन्त्रण आने लगे । मार्च 2010 में हरिद्वार महाकुम्भ में राज्य सरकार द्वारा रम्माण का प्रदर्शन कराया गया । अक्टूबर 2010 राष्ट्र मण्डल खेलों में सलूड़ गाँव की रम्माण की टीम का चार पाँच बार रोड शो कराया गया । साथ ही मंच पर भी रम्माण का प्रदर्शन हुआ ।
मुखौटों की चोरी
मुखौटे एक बार बनते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हीं का प्रयोग किया जाता है । नए मुखौटे तभी बनते हैं जब पुराने चोरी हों या क्षतिग्रस्त हो जाएं । 2004 में सलूड़ में प्राचीन मुखौटों की चोरी हो गई । इन मुखौटों का आज तक कोई पता नहीं चल पाया । ये सलूड़ के ग्रामीणें के हजारों साल पुराने थे । इन मुखौटे के चोरी होने के पीछे गाँव के निवासी भी निश्चित तौर पर किसी भीतर के आदमी का ही हाथ मानते हैं और चोरी के तुरंत बाद आरोप प्रत्यारोप का एक लम्बा दौर चला । पंचायत की पहल पर रम्माण के नए मुखौटे तैयार करवाए गए । जोशीमठ विकासखण्ड के अन्य कई गाँवों में मुखौटों की चोरी हुई है ।
मुखौटों के निर्माण की परम्परा
भूम्याल की पूजा - अर्चना के बाद गाँव के लोग ढोल - दमाऊँ के साथ जंगल को जाते है । वहाँ मुखाटों के लिए उपयुक्त भोज - वृक्ष चिह्नित कर उसे विधि विधान के साथ काटा जाता है । भोज के तने के ढाई - ढाई फिट के टुकड़े काट कर उन्हें बीच से चीर दिया जाता है । सभी टुकड़ों के मुखौटे नहीं बनाए जाते हैं । इन टुकड़ों को दूर फेंका जाता है । जिस टुकड़े पर गोलाई वाला हिस्सा ऊपर आसमान की ओर होता उसी का मुखौटा बनाया जाता । इन टुकड़ों पर गोबर और गोमूत्र का लेप लगाकर एक महीने के लिए मिट्टी में दबा दिया जाता है । इससे लकड़ी कोमल हो जाती । इसके बाद कारीगर इस पर संबंधित चरित्रों के मुखौटे उत्कीर्ण करता है । इसके बाद इन मुखौटों की पूजा अर्चना के बाद मंदिर में रख दिया जाता है ।
कुछ संस्थागत उल्लेखनीय कार्य
सन् 2010 में सलूड़ की रम्माण में गायन के लिए भल्ला नही आए थे । हे.न.ब.ग.वि.वि. के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र की पहल पर कुछ ही समय पहले सुभाई गाँव के थान सिंह जो कि भलदै नही हैं पर रम्माण का गायन जानते हैं , को बुलाकर उनका गायन रिकार्ड किया गया और फिर 18 पन्नों का एक आलेख तैयार किया गया । केन्द्र के छात्रों ने यह गायन सीखा और इस बार सलूड़ - डुंग्रा के रम्माण मेले में डॉ . डीआर पुरोहित जो इस केन्द्र के निदेशक हैं , की पहल पर इन छात्रों ने पारंपरिक रम्माणियों की तरह गायन किया । अब भल्लू की प्रथा धीरे धीरे खत्म होने के कारण रम्माण की मूल गाथा को पूरा जानने वाले लोगों का अभाव है । केन्द्र यह कोशिश कर रहा है कि समय रहते जितने भी लोक गायक इस गाथा को जानते हैं , उनका अभिलेखीकरण कर लिया जाय । आई.जी.एन.सी.ए. भी अपने स्तर पर अभिलेखीकरण पर लगी है ।
यदि आप रम्माण देखना चाहते हैं तो .......
मुख्य आयोजन अप्रैल में बैसाखी से 9 वें , 11 वें , अथवा 13 वें दिन बाद होता है । शुरूआत बैसाखी के दिन से ही हो जाती है । सलूड़ गाँव जनपद चमोली के विकासखण्ड मुख्यालय जोशीमठ से 10 कि ० मी ० की दूरी पर है । जोशीमठ से 5 कि ० मी ० पहले , राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कस्बा झड़कुला से सलूड़ - डुंग्रा के लिए सड़क जा रही है । झड़कुला से 200 मी 0 की दूरी पर पैट्रोल पम्प है । जोशीमठ से जीप - टैक्सी मिल जाती है । आवास की जोशीमठ में समुचित व्यवस्था है । सलूड़ से 8 कि ० मी ० के पैदल ट्रैक पर औली और इतनी ही दूरी पर ग्वरसौं के खुबसूरत बुग्याल हैं । दो - तीन घण्टे में औली - ग्वरसौँ पहुँचा जा सकता है । पहले औली में सलूड़ - डुंग्रा गाँवों की जमीन और मरूड़े थे । लेकिन अब उनकी जमीन का सरकार ने अधिग्रहण कर लिया है । ग्वरसों में अभी भी सलूड़ - डुंग्रा गाँवों के ' मरूड़े ' ( गौचर - पनघट ) है और गर्मियों के मौसम में गाँव के लोग अपने मवेशियों के साथ इनमें चले जाते हैं ।
यह आयोजन स्थानीय लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा विशुद्ध रूप से धार्मिक अनुष्ठान है , इसलिए स्थानीय रीति रिवाज और परम्पराओं का ध्यान रखना जरूरी है ।


