Lyrics has been copied to clipboard!
UTTARAKHAND GK UPDATES
उत्तराखण्ड कि थारू जनजाति
Tharu Janjati
उत्पति:- ऐसा माना जाता है कि ' थारू ' शब्द की उत्पत्ति ' स्थविर ' ( Sthavir ) से हुई है जिसका अर्थ होता है बौद्ध धर्म की थेरवाद शाखा / परंपरा को मानने वाला । कुछ विद्वान थारू मरुस्थल से आने के कारण थारू शब्द की उत्पत्ति मानते है ये खुद को महाराणा प्रताप के सैनिकों के वंशज बताते है
निवास स्थान:- थारू नेपाल और भारत के सीमावर्ती तराई क्षेत्र में भाई पाई जाने वाली एक जनजाति है थारू जाति का आवास क्षेत्र उत्तराखण्ड के तराई से लेकर बिहार तक तथा उत्तर नेपाल तक फैली हुई है । उत्तराखण्ड में इनकी आबादी मुख्यत : नैनीताल जनपद की सितारगंज तहसील तथा ऊधमसिंह नगर की खटीमा तहसील में ही केन्द्रित है । पौड़ी जनपद के लालढांग क्षेत्र में भी थारुओं की बस्तियां हैं ।
उत्तराखण्ड के अलावा ये उत्तर प्रदेश के लखीमपुर , गोंडा , बहराइच , महराजगंज , सिद्धार्थनगर , आदि जिलों , बिहार के चंपारण तथा दरभंगा जिलों तथा नेपाल के पूर्व में भेंची से लेकर पश्चिम में ' महाकाली ' नदी तक तराई एवं भावर क्षेत्रों में फैले हुए हैं ।
शारीरिक गठन:- थारू जाति के लोग कद में छोटे पीत वर्ण तिरछे नेत्र गाल की हड्डियां उभरी हुई शरीर और चेहरे पर बहुत कम और सीधे बाल समतल नासिका चौड़ी मुखाकृति वाले होते हैं जोकि मंगोल प्रजाति के अत्यधिक निकट है इनके पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक आकर्षक तथा सुंदर होती है
वेशभूषा:- थारू जाति के पुरूष हिन्दूत्व के प्रतीक के रूप में बड़ी चोटी रखते हैं तथा धोती , लंगोटी , अगा , कुरता , टोपी व साफा पहनते हैं । जबकि स्त्रियां रंगीन लहंगा , काली ओढ़नी , चोली और बूटेदार कुर्ता पहनती हैं तथा शरीर पर गुदना गुदवाती और पीतल , चांदी व कांसे की आभूषण पहनती हैं ।
भोजन:- तराई क्षेत्र के थारूओं का मुख्य भोजन चावल होता है क्योंकि यही यहां अधिक पैदा किया जाता है यह लोग चावल को भूनकर या उबालकर खाते हैं चावल के अलावा यह मछली, दाल, दूध, दही एवं अंडे का भी प्रयोग करते हैं मक्का की रोटी, मूली, गाजर की सब्जी भी खाई जाती है शुष्क ऋतु में ज्वार, चना, मटर आदि भी खाए जाते हैं आलू तथा चने के बने 'जैड' को बड़ी रुचि से खाते हैं
तंबाकू व मदिरा इनका प्रमुख पेय है मदिरा वे चावल द्वारा स्वयं निर्मित करते हैं जिसे वह वे 'जाड' कहते हैं
सामाजिक स्वरूप:- सामाजिक रूप से ये कई गोत्रों या जातियों या कुरियों में बंटे होते हैं । बड़वायक , बट्ठा , रावत , वृत्तियां , महतो व डहैत इनके प्रमुख गोत्र या घराने हैं । बड़वायक सबसे उच्च माने जाते हैं
पहले इनमें बदला विवाह प्रथा का अर्थात बहनों के आदान प्रदान का प्रचलन था लेकिन अब ‘ तीन टिकठी व अन्य प्रथा प्रचलित हैं । दोनों पक्षों की ओर से विवाह तय कर लिए जाने को ' पक्की पोढ़ी ' कहते है ।
• विवाह की सगाई रस्म को इनमें ' अपना पराया ' कहा जाता है । सगाई के बाद और विवाह से लगभग 10-15 दिन पूर्व लड़के पक्ष के लोग लड़की के घर जाते है और विवाह की तिथि निश्चित करते हैं । इस रस्म को बात कट्टी कहा जाता है ।
• इनमें विवाह प्रायः माघ या फुलौरा दूज में होता है । विवाह के के बाद लड़की एक दिन के लिए लड़के घर आती है फिर अपने भाई ज या पिता के साथ लौट जाती है ।
• विवाह के दो या तीन माह बाद चैत्र या बैशाख माह में लड़की स्थाई रूप से अपने पति के घर जाती है । इस रस्म को चाला कहते हैं ।
• इनमें विधवा विवाह की भी प्रथा है । यदि कोई विवाहित लड़की जिसका गौना ( चाला ) न आया हो अथवा उसका पति मर जाए तो लड़की का पिता उसे किसी के घर भेजकर बिरादरी को एक भोज देता है । इस प्रकार के विवाह भोज को ' लठभरवा भोज ' कहते हैं ।
• इनमें मुख्यतः एक पत्नी विवाह ही प्रचलित है लेकिन आवश्यकतानुसार बहुपत्नी विवाह भी हो सकता है ।
इनमें महिलाओं को पुरूषों की अपेक्षा उच्च स्थान प्राप्त है । इसी कारण कई परिवारों में पुरूष को भोजनालय में जाने का अधिकार नहीं है ।
इनमें संयुक्त एवं एकाकी परिवार प्रथा मिलती है , जिसका मुखिया परिवार का सबसे वृद्ध व्यक्ति होता है ।
• इस समाज में मातृसत्तात्मक , पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय पारिवारिक परम्परा पाई जाती है ।
धर्म:- थारू हिन्दू धर्म को मानते हैं । पछावन , खड्गाभूत , झाली , नगरयाई देवी , भूमिया ( बड़ा बाबा ) , कारोदेव , राकत , कलुवा सहित अनेक देवी - देवताओं , भूत - प्रेतों तथा अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं ।
कुछ देवताओं को ये बकरा , मुर्गा , सुअर व शराब आदि चढ़ाते हैं । थारू लोग इमानदार सहृदय शांत प्रकृति वाले होते हैं किंतु अब मैदानी निवासियों के संपर्क में इनमें कटुवा आ गई है - जैसे बाल हत्या,आत्महत्या करना आदि
त्योहार:- दशहरा , होली , दीपावली , माघ की खिचड़ी , कन्हैया अष्टमी और बजहर इनके प्रमुख त्यौहार हैं । बजहर नामक त्यौहार ज्येष्ठ या बैशाख में मनाया जाता है । थारूओं मैं होली एक सांस्कृतिक महोत्सव है जिसे वे वे पूरे एक महा 8 दिन तक मनाते हैं थारू जाति दीपावली को शोक पर्व के रूप में मनाते हैं
व्यवसाय:- थारू लोगों का थारू जनजाति का आर्थिक जीवन सामान्य रूप से कृषि ,पशुपालन व आखेट पर आधारित है थारू जनजाति मुख्य रूप से धान की खेती करते हैं इसके अलावा दाल,तिलहन, गेहूं एवं सब्जियों की भी खेती व मछली का शिकार करते हैं गाय,भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी आदि पशुओं का पालन, दूध,ऊन तथा मांस के लिए करते हैं

