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कस्तूरी मृग की औसतन आयु लगभग 20 वर्ष की होती हैं उत्तराखंड में कस्तूरी मृग की 4 प्रजातियां पाई जाती हैं ।मादा कस्तूरी के गर्भधारण अवधि 6 माह की होती है। कस्तूरी मृग उत्तराखंड अलावा हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और कश्मीर में भी पाया जाता है
कस्तूरी केवल नर में ही पाया जाता है ।कस्तूरी मृग से कस्तूरी 3 से 4 वर्ष के अंतराल 30 से 45 ग्राम तक प्राप्त किया जा सकता है ।कस्तूरी का औषधि उद्योग में प्रयोग दमा, मिर्गी, हृदय संबंधी रोग और दवाई बनाने में प्रयोग किया जाता है।
कस्तूरी मृग संरक्षण के लिए 1972 में केदारनाथ वन्य जीव विहार के अंतर्गत कस्तूरी विहार की स्थापना की गई ।महरूडी कस्तूरी मृग अनुसंधान की स्थापना 1977 में की गई थी। सर्वाधिक मात्रा में कस्तूरी मृग अस्कोट वन्य जीव अभ्यारण में पाए जाते हैं ।चमोली जिले के कंचुला खर्क में 1982 को कस्तूरी में प्रजनन व संरक्षण केंद्र की स्थापना की गई थी ।राज्य में 2005 तक 279 कस्तूरी में पाए गए थे। कस्तूरी मृग का मुख्य भोजन केदार पत्ती व रिंगाल व जंगली घास होता है।
उत्तराखण्ड का राज्य-चिह्न अथवा उत्तराखण्ड का प्रतीक-चिह्न, उत्तराखण्ड सरकार की राजकीय मोहर है, जिसका उपयोग राज्य द्वारा सभी प्रकार के प्रशासनिक एवं राजकीय क्रियाकलापों में उत्तराखण्ड राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिये किया जाता है। इसे उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के समय दिनाँक 1नवम्बर 2000 को राज्य की नवगठित अन्तरिम सरकार द्वारा अधिकृत किया गया था।
| उत्तराखण्ड का राज्य-चिह्न | |
|---|---|
| सामंत | उत्तराखण्ड सरकार |
अपनाया गया | 1नवम्बर 2000 |
कलग़ी | लाल पृष्ठभूमि पर आकृत अशोक की लाट |
| ढाल | श्वेत पृष्ठभूमि एवं नीली परिधि सहित चार जलधाराओं से युक्त हीरे के आकार वाला प्रतीक चिह्न |
| सहायक | हिमालय पर्वत के शिखर |
ध्येयवाक्य | "सत्यमेव जयते" (भारत का राष्ट्रीय उद्घोष) |
| अन्य तत्व | चिह्न के निचले भाग पर नीले रंग में अंकित "उत्तराखण्ड राज्य" |
| प्रयोग | उत्तराखण्ड राज्य का राजकीय प्रतिनिधित्व |
उत्तराखण्ड का राज्य-चिह्न श्वेत पृष्ठभूमि एवं नीली परिधि सहित चार जलधाराओं से युक्त हीरे के आकार वाला प्रतीक-चिह्न है, जिसे हिमालय पर्वत के शिखरों द्वारा सहारा देते हुये दर्शाया गया है। इसके ऊपरी भाग पर बनी कलग़ी में लाल पृष्ठभूमि युक्त भारत का राष्ट्रीय चिह्न, अशोक की लाटआकृत है, जिसके नीचे संस्कृत में भारत का राष्ट्रीय उद्घोष, सत्यमेव जयते संलग्न है। राज्य-चिह्न के निचले भाग पर नीले रंग में "उत्तराखण्ड राज्य" अंकित है।
प्रतीकात्मकता
राज्य-चिह्न के ऊपरी भाग में दर्शायी गयी लाल रंग की पृष्ठभूमि, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान शहीद हुये राज्य आन्दोलनकारियों के रक्त की प्रतीक है। श्वेत रंग की पृष्ठभूमि शान्तिप्रिय प्रकृति वाले उत्तराखण्डवासियों की प्रतीक है। पर्वतशिखर हिमालयी राज्य की भौगोलिक एवं पारस्थितिक प्रकृति को दर्शाता है तथा चार जलधारायें राज्य की चार बड़ी नदियों; गंगा, यमुना, काली एवं रामगंगा को दर्शाती हैं। नीला रंग राज्य की पवित्र नदियों के शुद्ध जल का प्रतीक है।उत्तराखण्ड का राज्य-चिह्न अथवा उत्तराखण्ड का प्रतीक-चिह्न, उत्तराखण्ड सरकार की राजकीय मोहर है, जिसका उपयोग राज्य द्वारा सभी प्रकार के प्रशासनिक एवं राजकीय क्रियाकलापों में उत्तराखण्ड राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिये किया जाता है।[1] इसे उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के समय दिनाँक ९ नवम्बर २००० को राज्य की नवगठित अन्तरिम सरकार द्वारा अधिकृत किया गया था।
| उत्तराखण्ड का राज्य-चिह्न | |
|---|---|
| विवरण | |
| सामंत | उत्तराखण्ड सरकार |
| अपनाया गया | ९ नवम्बर २००० |
| कलग़ी | लाल पृष्ठभूमि पर आकृत अशोक की लाट |
| ढाल | श्वेत पृष्ठभूमि एवं नीली परिधि सहित चार जलधाराओं से युक्त हीरे के आकार वाला प्रतीक चिह्न |
| सहायक | हिमालय पर्वत के शिखर |
| ध्येयवाक्य | "सत्यमेव जयते" (भारत का राष्ट्रीय उद्घोष) |
| अन्य तत्व | चिह्न के निचले भाग पर नीले रंग में अंकित "उत्तराखण्ड राज्य" |
| प्रयोग | उत्तराखण्ड राज्य का राजकीय प्रतिनिधित्व |
उत्तराखण्ड का राज्य-चिह्न श्वेत पृष्ठभूमि एवं नीली परिधि सहित चार जलधाराओं से युक्त हीरे के आकार वाला प्रतीक-चिह्न है, जिसे हिमालय पर्वत के शिखरों द्वारा सहारा देते हुये दर्शाया गया है। इसके ऊपरी भाग पर बनी कलग़ी में लाल पृष्ठभूमि युक्त भारत का राष्ट्रीय चिह्न, अशोक की लाटआकृत है, जिसके नीचे संस्कृत में भारत का राष्ट्रीय उद्घोष, सत्यमेव जयते संलग्न है। राज्य-चिह्न के निचले भाग पर नीले रंग में "उत्तराखण्ड राज्य" अंकित है।
प्रतीकात्मकतासंपादित करें
राज्य-चिह्न के ऊपरी भाग में दर्शायी गयी लाल रंग की पृष्ठभूमि, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान शहीद हुये राज्य आन्दोलनकारियों के रक्त की प्रतीक है। श्वेत रंग की पृष्ठभूमि शान्तिप्रिय प्रकृति वाले उत्तराखण्डवासियों की प्रतीक है। पर्वतशिखर हिमालयी राज्य की भौगोलिक एवं पारस्थितिक प्रकृति को दर्शाता है तथा चार जलधारायें राज्य की चार बड़ी नदियों; गंगा, यमुना, काली एवं रामगंगा को दर्शाती हैं। नीला रंग राज्य की पवित्र नदियों के शुद्ध जल का प्रतीक है।
मोनाल विश्व की सुंदरतम पक्षियों में से एक है। इसको हिमालय मोर की संज्ञा भी प्रदान की गई है इस का वैज्ञानिक नाम लोफोफोरस इम्पेजेन्स है, ये उत्तराखंड का राज्य पक्षी है व नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी है , इसे नेपाल की स्थानीय भाषा में मान्याल या मुन्याल कहते हैं
ये उड़ीसा के राज्य पक्षी मोर के कुल का है जो कि फिसिएनीडी परिवार का है
कहाँ देखने को मिलता है यह पक्षी
हिमालय पर्वत के ऊंचे बर्फीले भागों का पक्षी है। इस को भारत पाकिस्तान के सीमावर्ती भागों से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक 2300 मीटर से 5000 मीटर तक की ऊंचाई वाले भागों में देखा जा सकता है
उत्तराखंड ,हिमांचल ,सिक्किम ,अरुणाचल प्रदेश में इनकी संख्या अधिक है, यह नेपाल, भूटान ,पाकिस्तान ,चीन ,तिब्बत अफगानिस्तान, में भी पाया जाता है।
कहाँ रहता है
मोनाल बर्फीले मैदानों, पहाड़ी जंगलों ,छोटी झाड़ियों, घास वाले पथरीले चट्टानी ढलानों में अकेले या छोटे छोटे छंदों में रहना पसंद करता है ।जो सर्दियों के आरंभ में तराई क्षेत्रों में आ जाता है लेकिन वसंत ऋतु के प्रारंभ होते ही वह पुनः ऊंचाई वाले बर्फीले क्षेत्रों में चला जाता है
यह देवदार के पेड़ों पर रहना पसंद करता है जहां तक मानव सरलता तक नहीं पहुंच सकता , ये एक शर्मिला पक्षी है। मोनाल की बर्फ या जमीन खुरचने की आदत होती है ,जो दिन भर अपने शक्तिशाली चौच से जमीन अथवा बर्फ को खुरचता रहता है यह रात को बसेरा चट्टानों या देवदार के पेड़ों पर करता है।
क्या है विरासत- विरासत का अर्थ होता है प्राकृतिक धरोहर या पिछली पीढ़ी से मिली धरोहर जो अगली पीढ़ी में हम दे रहे हैं इसमें हम संस्कृति ,परंपरा ,इतिहास, पुरातत्व , स्मारक ,संकटापनजीव हैं उन्हें शामिल करते हैं
किसे कहा जाता है विश्व विरासत -
जो प्रकृति के धरोहर को संजोने या नष्ट होने से बचाने के लिए वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने यूनेस्को की स्थापना की थी इसमें उन देशों की संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रयास किया जाता है जो अभी विलुप्त होने के कगार में है जो अभी असुरक्षित हैं , और जो दुर्लभ है जिन्हें हम भविष्य में खोना नही चाहते।
यूनेस्को ने भारत का पहला शहर अहमदाबाद को चुना था जिसे विश्व विरासत शहर की सूची में शामिल किया गया था अभी तक भारत में 36 स्थलों को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया है उनमें से उत्तराखंड की पांच विश्व विरासत की सूची में शामिल है इसमें फूलों की घाटी, रम्माण ,नंदा देवी बायोस्फीयर ,भारतीय वन्यजीव संस्थान ,कुंभ मेला शामिल है
1.रम्माण- रम्माण एक उत्सव है इसे 2 अक्टूबर 2009 विश्व की अउत्तराखंड के पांच विश्व विरासत uk gk updatesमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया गया है ये उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में कुछ गांवों द्वारा मनाया जाता है इसमें सलूड ,डूग्रा सेलंग आदि गांव आते हैं यह हर साल वैशाख के महीने में आयोजित होता है और रम्माण का शाब्दिक अर्थ रामायण से है जिसमें गांव के लोग इसमें अपनी प्रस्तुति देते हैं इसमें लोकनाट्य, स्वांग , देव यात्रा, पूजा अनुष्ठान ,ढोल दमऊ के साथ लकड़ी के मुखौटा का नृत्य किया जाता है इसमें राम -सीता , लक्ष्मण, हनुमान आदि के पात्रों को र शामिल किया जाता है
इसे वर्ष 2008 में इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स ने दिल्ली में रामायण अंकन मंचन और वाचन विषय पर एक सम्मेलन में आयोजित किया था
2. फूलों की घाटी- फूलों की घाटी चमोली में स्थित है, जो हेमकुंड साहिब के पास स्थित है ,यहाँ सैकड़ों प्रजाति के फूलों की एक विस्तृत घाटी है यह घाटी अपने सुंदर पुष्पों के लिए विश्व विख्यात है इस घाटी को संरक्षण के उद्देश्य से सन 1982 में राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया और वर्ष 1988 में यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत कि श्रेणी में शामिल किया
1931 में सबसे पहले यहां पर एक अंग्रेजी पर्वतारोही फ्रैंक स्माइथ भटकते हुए अपने साथियों की तलाश में यहां पहुंचे थे और उन्होंने यह सुंदर दृश्य देखा ,वे 6 वर्ष बाद अपने सहयोगी वनस्पति शास्त्री RL हाल्ड्सवर्थ के साथ यहां वापस आए और उन्होंने यहां पर फूलों का विस्तृत अध्ययन किया और 1938 में इस घाटी पर" वैली ऑफ फ्लावर "नाम की इन्होंने पुस्तक भी लिखी
3.नंदा देवी बायोस्फियर - नंदा देवी को जैव विविधता के वनस्पति के संरक्षण के लिए 6 नवंबर 1982 में राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया और वर्ष 2005 में इसे विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया नंदा देवी बायोस्फीयर का अधिकतम भाग चमोली जिले में है और इस रिजर्व में तेंदुआ, कस्तूरी मृग , भरल ,मोनाल, और हजारों पशु- पक्षियों और वनस्पतियों को संरक्षित किया गया है
वर्ष 1982 में नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना राष्ट्रीय उद्यान के तौर पर की गई थी। यह उत्तर भारत के उत्तराखंड राज्य में नंदा देवी की पहाड़ी (7816 मी) पर स्थित है। वर्ष 1988 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। इस उद्यान को 1982 में अधिसूचना द्वारा संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के नाम से स्थापित किया गया था लेकिन बाद में इसका नाम नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान कर दिया गया। फूलों की करीब 312 प्रजातियों समेत यहां 17 दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं
4. भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून - भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून में स्थित है जिसे वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता है, 29 अगस्त 2014 में यूनेस्को ने इसे प्राकृतिक धरोहर केंद्र में शामिल किया , और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री प्रकाश जावेडकर ने इस केंद्र का उद्घाटन किया, भारतीय वन्यजीव संस्थान की कार्यशैली को सबसे बेहतर मानकर ही यूनेस्को ने विश्व के पहले प्राकृतिक धरोहर प्रबंधन केंद्र लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून को चुना है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में बनाए गए इस केंद्र से एशिया प्रशांत क्षेत्र के चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे 50 देश प्राकृतिक धरोहर संरक्षण प्रशिक्षण लेंगे। दून स्थित यूनेस्को केंद्र के दायरे में पूरे प्रशांत क्षेत्र को रखा गया है।
5. कुंभ मेला- कुंभ मेला को विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया गया है , जिसे 7 दिसंबर 2017 को दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप में आयोजित 12 सत्र में कुंभ मेला को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में घोषित किया गया
कुंभ मेला भारत के चार स्थानों पर आयोजित होता है जिसमें हरिद्वार और इलाहाबाद में प्रत्येक 6 वर्ष में अर्धकुंभ लगता है और हर 12 वर्ष में महाकुंभ मेले का आयोजन होता है।
हरिद्वार इलाहाबाद नासिक और उज्जैन की इन 4 स्थानों पर प्रति 4 वर्ष के अंतराल में कुंभ मेले का आयोजन होता है और जहां परंपरा सदियों से चली आ रही है इसलिए यूनेस्को ने इसे प्रकृतिक संस्कृतिक धरोहर में शामिल किया है
By ,Uk gk updates (प्रवीन बर्त्वाल )
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