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उत्तराखंड के पांच विश्व विरासत uttarakhand gk Pdf
क्या है विरासत- विरासत का अर्थ होता है प्राकृतिक धरोहर या पिछली पीढ़ी से मिली धरोहर जो अगली पीढ़ी में हम दे रहे हैं इसमें हम संस्कृति ,परंपरा ,इतिहास, पुरातत्व , स्मारक ,संकटापनजीव हैं उन्हें शामिल करते हैं
किसे कहा जाता है विश्व विरासत -
जो प्रकृति के धरोहर को संजोने या नष्ट होने से बचाने के लिए वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने यूनेस्को की स्थापना की थी इसमें उन देशों की संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रयास किया जाता है जो अभी विलुप्त होने के कगार में है जो अभी असुरक्षित हैं , और जो दुर्लभ है जिन्हें हम भविष्य में खोना नही चाहते।
यूनेस्को ने भारत का पहला शहर अहमदाबाद को चुना था जिसे विश्व विरासत शहर की सूची में शामिल किया गया था अभी तक भारत में 36 स्थलों को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया है उनमें से उत्तराखंड की पांच विश्व विरासत की सूची में शामिल है इसमें फूलों की घाटी, रम्माण ,नंदा देवी बायोस्फीयर ,भारतीय वन्यजीव संस्थान ,कुंभ मेला शामिल है
1.रम्माण- रम्माण एक उत्सव है इसे 2 अक्टूबर 2009 विश्व की अउत्तराखंड के पांच विश्व विरासत uk gk updatesमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया गया है ये उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में कुछ गांवों द्वारा मनाया जाता है इसमें सलूड ,डूग्रा सेलंग आदि गांव आते हैं यह हर साल वैशाख के महीने में आयोजित होता है और रम्माण का शाब्दिक अर्थ रामायण से है जिसमें गांव के लोग इसमें अपनी प्रस्तुति देते हैं इसमें लोकनाट्य, स्वांग , देव यात्रा, पूजा अनुष्ठान ,ढोल दमऊ के साथ लकड़ी के मुखौटा का नृत्य किया जाता है इसमें राम -सीता , लक्ष्मण, हनुमान आदि के पात्रों को र शामिल किया जाता है
इसे वर्ष 2008 में इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स ने दिल्ली में रामायण अंकन मंचन और वाचन विषय पर एक सम्मेलन में आयोजित किया था
2. फूलों की घाटी- फूलों की घाटी चमोली में स्थित है, जो हेमकुंड साहिब के पास स्थित है ,यहाँ सैकड़ों प्रजाति के फूलों की एक विस्तृत घाटी है यह घाटी अपने सुंदर पुष्पों के लिए विश्व विख्यात है इस घाटी को संरक्षण के उद्देश्य से सन 1982 में राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया और वर्ष 1988 में यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत कि श्रेणी में शामिल किया
1931 में सबसे पहले यहां पर एक अंग्रेजी पर्वतारोही फ्रैंक स्माइथ भटकते हुए अपने साथियों की तलाश में यहां पहुंचे थे और उन्होंने यह सुंदर दृश्य देखा ,वे 6 वर्ष बाद अपने सहयोगी वनस्पति शास्त्री RL हाल्ड्सवर्थ के साथ यहां वापस आए और उन्होंने यहां पर फूलों का विस्तृत अध्ययन किया और 1938 में इस घाटी पर" वैली ऑफ फ्लावर "नाम की इन्होंने पुस्तक भी लिखी
3.नंदा देवी बायोस्फियर - नंदा देवी को जैव विविधता के वनस्पति के संरक्षण के लिए 6 नवंबर 1982 में राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया और वर्ष 2005 में इसे विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया नंदा देवी बायोस्फीयर का अधिकतम भाग चमोली जिले में है और इस रिजर्व में तेंदुआ, कस्तूरी मृग , भरल ,मोनाल, और हजारों पशु- पक्षियों और वनस्पतियों को संरक्षित किया गया है
वर्ष 1982 में नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना राष्ट्रीय उद्यान के तौर पर की गई थी। यह उत्तर भारत के उत्तराखंड राज्य में नंदा देवी की पहाड़ी (7816 मी) पर स्थित है। वर्ष 1988 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। इस उद्यान को 1982 में अधिसूचना द्वारा संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के नाम से स्थापित किया गया था लेकिन बाद में इसका नाम नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान कर दिया गया। फूलों की करीब 312 प्रजातियों समेत यहां 17 दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं
4. भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून - भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून में स्थित है जिसे वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता है, 29 अगस्त 2014 में यूनेस्को ने इसे प्राकृतिक धरोहर केंद्र में शामिल किया , और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री प्रकाश जावेडकर ने इस केंद्र का उद्घाटन किया, भारतीय वन्यजीव संस्थान की कार्यशैली को सबसे बेहतर मानकर ही यूनेस्को ने विश्व के पहले प्राकृतिक धरोहर प्रबंधन केंद्र लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून को चुना है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में बनाए गए इस केंद्र से एशिया प्रशांत क्षेत्र के चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे 50 देश प्राकृतिक धरोहर संरक्षण प्रशिक्षण लेंगे। दून स्थित यूनेस्को केंद्र के दायरे में पूरे प्रशांत क्षेत्र को रखा गया है।
5. कुंभ मेला- कुंभ मेला को विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया गया है , जिसे 7 दिसंबर 2017 को दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप में आयोजित 12 सत्र में कुंभ मेला को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में घोषित किया गया
कुंभ मेला भारत के चार स्थानों पर आयोजित होता है जिसमें हरिद्वार और इलाहाबाद में प्रत्येक 6 वर्ष में अर्धकुंभ लगता है और हर 12 वर्ष में महाकुंभ मेले का आयोजन होता है।
हरिद्वार इलाहाबाद नासिक और उज्जैन की इन 4 स्थानों पर प्रति 4 वर्ष के अंतराल में कुंभ मेले का आयोजन होता है और जहां परंपरा सदियों से चली आ रही है इसलिए यूनेस्को ने इसे प्रकृतिक संस्कृतिक धरोहर में शामिल किया है
By ,Uk gk updates (प्रवीन बर्त्वाल )

