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अकितरि: उत्तराखंड के भेड़ पालकों का देवता
अकितरि उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र रवांई-जौनपुर तथा जौनसार-बावर के भेड़ - बकरी पालकों द्वारा बहुमान्य भेड़ों के रक्षक देवता जाख/श्रीगुल देवता / की देवयात्रा है। यह यात्रा वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को आयोजित की जाती है।
देवता का मूलस्थान
शिरगुल/श्रीकुल देवता का स्थान, जिसे उसका मूलस्थान भी माना जाता है, रवांई और बावर की सीमा पर जंगल के बीच जाख डांडे पर अवस्थित है। यहां पर देवदार की बड़ी-बड़ी बल्लियों से बना एक मंदिर है। मंदिर के शीर्ष के काष्ठ पर एक बकरी का बच्चा बनाया गया है जो अपनी मां का दूध पी रहा है।
यात्रा का क्रम
इस दिन बावर के भटाड़ गांव से देवता का डोला आता है। सायंकाल तक आसपास के गांवों के लोग ढोल, नगाड़े, तूरी, रणसिंगा आदि गाजे-बाजे के साथ देवता की पूजा आराधना के लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। भेड़ों की बलि चढ़ाई जाती है। अंधेरा होने पर आठ-नौ बजे के लगभग गाजों-बाजों के साथ देवता की पूजा की जाती है। धामी/डंगरियों/पस्वाओं में देवता का अवतरण व देवनृत्य होता है। नि:सन्तान महिलाएं देवता के सम्मुख रातभर हाथ जोड़कर सन्तानार्थ मनोतियाँ करती हैं। इनके पूरा होने पर दुबारा जाकर देवता को चढ़ावा चढ़ाती हैं। यात्री लोग मांस और भात का भोजन करके रात भर नाचते गाते रहते हैं और प्रातःकाल उजाला होने पर अपने घरों को जाते हैं।
अकितरि का महत्व
अकितरि मेषपालकों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह देवता भेड़ों - बकरियों की रक्षा करता है और उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखता है। अकितरि के दौरान मेषपालक अपने भेड़ों को देवता के दर्शन के लिए लाते हैं और उनकी पूजा करते हैं।
अकितरि की विशेषताएं
* यह एक प्राचीन त्योहार है जो सदियों से मनाया जाता रहा है।
* यह त्योहार मेषपालकों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
* यह त्योहार देवता के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।
* यह त्योहार सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी प्रतीक है।
निष्कर्ष
अकितरि उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार मेषपालकों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और देवता के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। यह त्योहार सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी प्रतीक है।


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