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उत्तराखंड का राज्य पशु कस्तूरी मृग
कस्तूरी मृग को हिमालय का मस्क डियर भी कहा जाता है इस का वैज्ञानिक नाम मास्कस गास्टर है ।यह राज्य के जंगलों में केदारनाथ फूलों की घाटी पिथौरागढ़ उत्तरकाशी में 3600 से 4400 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं तथा यह भूरे रंग होता में है और काले पीले रंग के धब्बे पाए जाते हैं इसके पैरों में चार खुर ,2 बाहर निकले दांत और यह लगभग 20 इंच या लंबा होता है
कस्तूरी मृग की औसतन आयु लगभग 20 वर्ष की होती हैं उत्तराखंड में कस्तूरी मृग की 4 प्रजातियां पाई जाती हैं ।मादा कस्तूरी के गर्भधारण अवधि 6 माह की होती है। कस्तूरी मृग उत्तराखंड अलावा हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और कश्मीर में भी पाया जाता है
कस्तूरी केवल नर में ही पाया जाता है ।कस्तूरी मृग से कस्तूरी 3 से 4 वर्ष के अंतराल 30 से 45 ग्राम तक प्राप्त किया जा सकता है ।कस्तूरी का औषधि उद्योग में प्रयोग दमा, मिर्गी, हृदय संबंधी रोग और दवाई बनाने में प्रयोग किया जाता है।
कस्तूरी मृग संरक्षण के लिए 1972 में केदारनाथ वन्य जीव विहार के अंतर्गत कस्तूरी विहार की स्थापना की गई ।महरूडी कस्तूरी मृग अनुसंधान की स्थापना 1977 में की गई थी। सर्वाधिक मात्रा में कस्तूरी मृग अस्कोट वन्य जीव अभ्यारण में पाए जाते हैं ।चमोली जिले के कंचुला खर्क में 1982 को कस्तूरी में प्रजनन व संरक्षण केंद्र की स्थापना की गई थी ।राज्य में 2005 तक 279 कस्तूरी में पाए गए थे। कस्तूरी मृग का मुख्य भोजन केदार पत्ती व रिंगाल व जंगली घास होता है।
कस्तूरी मृग विहार
उत्तराखंड मे इस नाम के दो मृग विहार हैं उनमें से एक गढ़वाल मंडल के चमोली जनपद के गोपेश्वर -चोपता मार्ग पर स्थित है। वर्ष 2015 में में यहाँ अंतिम बार मात्र एक कस्तूरी मृग देखा गया था ।
दूसरा कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जनपद में चौकोड़ी के निकट है जो कोटमन्या से उत्तर पश्चिम में 6 किलोमीटर पर 2500 की ऊंचाई पर है इसमें दो दर्जन कस्तूरा मृग संरक्षित थे , किंतु दिसंबर 2010 तक यहाँ एक भी कस्तूरी मृग बच नहीं पाया ।
कस्तूरी संग्रहण केंद्र
उत्तराखंड का कस्तूरी मृग संग्रहण केंद्र बागेश्वर जनपद में बागेश्वर और पिथौरागढ़ जनपद की सीमा पर महरूडी कस्तूरी मृग (कमेटी देवी )पर स्थित है इसकी स्थापना 1974 में की गई थी सर्वप्रथम यहां पर 4 नर कस्तूरी लाए गए थे, जिनसे कस्तूरी निकाला गया था और अंतिम बार 1985 में 9 नर कस्तूरा लाए गए थे ।कस्तूरी मृग से कस्तूरी सितम्बर महीने में वैज्ञानिकों द्वारा निकाला जाता है और यह 2-3वर्ष में मात्र 1 बार ही एक नर मृग से निकाला जाता है ।
