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उत्तराखंड जीके अपडेट्स
उत्तराखंड की गढ़वाली बोली को यूनेस्को ने विलुप्त की श्रेणी में रखा
उत्तराखंड में मुख्य कर 3 भाषाएँ बोली जाती है जिसमें गढ़वाली , कुमाउनी और जौनसारी बोली आती है, और ये 3 तीनों भाषाएँ मिलकर एक सुन्दर उत्तराखंड का निर्माण करती है ।उत्तराखंड में गढ़वाली बोले जाने का औसतन प्रतिशत 46% , कुमाऊनी का 42% और जौनसारी का 8%प्रतिशत है
हाल ही में यूनेस्को ने अपनी एक रिपोर्ट में गढ़वाली बोली/ भाषा को विलुत की श्रेणी में रख दिया है । जहाँ पर आज से पहले गढ़वाली का प्रभुत्व सबसे अधिक था आज वो लुढक कर 19% पर आ गया है और इसकी जगह पर हिंदी भाषा ने अपने पैर पसार लिए हैं ।
क्या रही वजह जो गढ़वाली भाषा विलुत होने लगी?
उत्तराखंड में जैसे जैसे शिक्षा का विस्तार होता गया लोग हिंदी और अंग्रेजी की तरफ ज्यादा आकर्षित होने लगे । शायद शिक्षा विस्तार के वक़्त स्कूल और कॉलेज में ये ध्यान नहीं दिया गया ,कि गढ़वाली भाषा को भी एक विषय के रूप में पढ़ाया जाय, और धीरे - धीरे इसको बोलने में भी लोगों के मन में एक हिन भावना उत्पन्न होने लगी है और इसी उत्पत्ति की वजह से आज गढ़वाली भाषा विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है शायद उत्तराखंड में भी अन्य राज्यों की अपेक्षा अपनी भाषा पर जोर देता तो वह भी पंजाबी, तेलुगू , गुजरती अन्य भाषाओं जैसा अपने राज्य में गर्व से बोला जाता
उत्तराखंड और हिंदी बोले जाने प्रदेशों को छोड़ कर अन्य सभी राज्यो में वहां की जनता अपनी संस्कृति का परिचय अपनी भाषा से शुरू करती है । आज गढ़वाली भाषा को एक दूसरे से बोलना ही एक अपमानजनक लगता है जिसे लोग या तो घृणा की नज़र से या फिर एक ठेठ पहाड़ी या ग्वार कहना पसंद करते है । यही कारण रहा की देखा देखी के इस दौर में पहाड़ अपनी गढ़वाली भाषा और संस्कृति को खोते जा रहा है

