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 Garhwali/ Kumauni and jaunsari  Relationship
 Uttrakhand family relationship 
Garhwali Rishte Naate,
 Kumaoni relationship
 Jaunsari relationship
गढ़वाली कुमाऊनी और जौनसारी रिश्ते -नाते
 गढ़वाली रिश्ते नाते
 कुमाऊनी रिश्ते नाते
जौनसारी रिश्ते नाते 
Uttrakhand family relationship



हिंदी  गढ़वाली  कुमाउनी  जौनसारी 
माँ  ब्वे,
जिया 
ईजा  ईजी
पिता जी  बाबा  बौजू  बाबा 
दादा  दादा  बूब, नाना 
दादी   दादी  आमा  नानी 
बड़ा भाई  भैजी,
दिदा
दाद,
दाजू
दादा
छोटा भाई भुला भै भाया
बडी बहन दीदी,
ज्येठी दिदी
दिदी दादी
छोटी बहन भूली,
कांण्सी भूली
भुलि भायटी
पति जवैं,
कज्ये,
मालिक,
बैख
बैख

आदिम
ख्वांद
पत्नी ब्वारी,
 सैणी,
जनानी,
कज्याण
स्यैणी जोरू
देवर दयूर दयोर देवर
देवरानी दयूराण दयोराणि देवरानी
ननद नणद नौण्द ध्याण
नन्दोई जमै,
जवैंऽजी
जमै मितर
ताऊ बौड़ा,
 बड़जी
ज्यठबाज्यू जेठा बाबा
ताई बौडी जी,
बौडी
ज्यड़े,
ठुल ईज
जेठी ईजी
औरत कज्याण,
जननी
स्यैणी बेटमुड़ी
चाचा काका,
चचा
काक काका
चाची काकी,
चच्ची
काखि काकी
जीजा भैना भिन बैना
फूफ़ा मामा भौ
भिन्ज्यू
फूफ़ा
बुआ पुफु पूइज्यू
बुबु
फुफ़ी
भांजा भांणजु भाणिज भांणजा
भांजी भांणजी भांणजी भांणजी
मौसा मौसा काक मोउसा
मौसी ज्येठी मां,
कांणसी मां,
मौसी
कैंज मोउसी
लड़का लड़ीक
नौन्याल
लोडू
च्योल छोउटा
लड़की नौनि
ब्येटी
लोड़ी
चेली छौउटी
भाभी बौ
बौजी
बोजि बोउठी
भतीजा भतीजू
भजीतू
भद्यो भरचा
भतीजी भतीजी
भजीती
भदे भरची
समधी समदी समदि समधी
समधिन समद्येण समदिणी समधिन
ससुर सोरा जी सौर सेरसा
सास सासु सासु सासू
नाती नाती नाती नातूटा
नातिन नतेणी नातिणी नातूटी
नाना नना बड़बाज्यू नाना
नानी नन्नी आमा नानी
बच्चा नौनू,
नौन्याल
भौ लड़कोटो
जेठ ज्येठा जी ज्याठज्यू भै
जेठानी ज्यठाण ज्यठाणी दीदी
जमाई जवैं जमैं ज्वाई
जेठू ज्योठू  जेठू मितर
 Garhwali/ Kumauni and jaunsari learn language time 
 
आप वीडियो के माध्यम से गढ़वाली कुमाऊनी और जौनसारी भाषा आसानी से सीख सकते हैं, यदि आप हमारे यूट्यूब चैनल से जुड़ना चाहते हैं तो इसके लिए इस लिंक पर क्लिक करिए 👉 Garhwalii. Com 




हिंदी  गढ़वाली  कुमाउनी  जौनसारी 
आजकल आजब्याली ऐलबेर आजकाला
इसबार ऐसू  ऐलबेर  एइंसू
दिन दिन दिन दूस
परसों परस्यों पोरुं परों
छहमाह छमाई छमासी छमाई
ब्रह्ममुर्त
तड़के
रतब्यांणी रत्ति,
रात्ति
रातियें
आजकल आजब्याली ऐलबेर आजकाला
आजकल आजब्याली ऐलबेर आजकाला
एक पल झट घडे झिटघडि घड़
घड़
दोपहर दोफरी,
दुपर
दुपरी
धुपर
घमा
तीन साल परारे साल परारि बेर तीन साल
पोइले
दक्षिण दखीण दक्षिण दक्खिड़
देर अबेर अबेर,
ढील
बै
आज आज आज ऐला
आने वाला
कल
भोल भोव दोतीया
 अर्धरात्रि  अदीरात अधरात आदीरात
Uttrakhand language in Furuits Name
 उत्तराखंड की भाषा में फलों के नाम

Garhwali/ Kumauni and jaunsari
 Easy learn to Uttarakhand language
 ईजी लर्न टू उत्तराखंड लैंग्वेज
 How to learn Uttarakhand language
 Easy Lern 3 types way in Uttarakhand language 

गढ़वाली, कुमांउनी, और जौनसारी
भाषा मेें फलों के नाम


हिंदी  गढ़वाली  कुमाउनी  जौनसारी 
हिसालू  हिसोल,
हिस्वौल
हिसाव हिसऊ
 संतरा नारंगी नारंगी
संतरा
सेब स्यो स्यो सेऊ
शहतूत सैतूस,
सैतूत
किमू किमू
लीची लीची
लीची
लाईची
माल्टा संतरा
माल्टा माल्टा
बेर ब्यौर बेर बेर
पपीता पपेतू
पपीतू
पपित पबीता
जामुन जामुण जामुन जामीण
छुआरा छंवार छवोरा छ्वारा
घिंगारू घिंग्यारु घिंगारू अंगारोई
खुबानी चूला,
चुई,
चुली,
खुमानी खुमानी
खरबूज खरबूजा
खरबूज
खरबूजा
केला क्योवा
क्याव केवाड
आंवला औंला औंल,
उंव
अईणुवा
आडू आरु आरु
आर
आरू
आम आम आम आम
 आलू बुखारा  पोलम  अलबखर आलू बुखारा
अनार दाडम्या
दाड़ीम
अनार अनार
घिंगोड़ा घिंगारू

घिंगार
घिगार
किनगोड किरमोड़
किनगोड़
किनगाड किनगाड़
Garhwali story

तीन घरजवैं अर सासू गढ़वाली कहानी
Garhwali Story in Garhwali language


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समन्या दगड़यों आज की गढ़वाली कहानी च 3 घर जवें और तोंकी सासू जी की....


यीं कहानी मा  सास च (गोदांबरी ) जो अपड़ी 3 ब्येटियो ब्यो 3 घर जवैयों का गैल करवे देंदी, वैंथे लग दू छै की यी तीनी घर जमैं डेरा कु काम सम्भाल देला  पर सी तीनी जमें निकट्टू आलसी छया, ना त सी डेरा कु काम करदा और ना नौकरी करदा छां ।
यौ दिन गोदांबरी अपड़ी बेट्यों त बोलीदीन की तुम तींनी गौं जाण कु बानु बणे ल्या और 4 मैंना ले भेर जै की अपड़ा जवाईयों तें सबक सिखो ।

गोदांबरी जी अपड़ा तिनी जवैयों तें बुले की बात करदी
सासु -
"अवतार, विवेक, और सुमीत." देखा जवाईयां मैं तुम तीनों दग्ड बहुत मोह च, ये लै तुम थैं घर जमैं बणें की ल्याई

पहला जमाई -
 माजी सीधा बोला ना क्या बोल्ण चांदा आप, आपेऽत इज्जत भी भौत करदा हम,

दूसरा जमाई -अप जन सासू अर कमौंदार बवारियां सब्यों तैं थोड़ी ना मिल्दी ।

तीसरा जमाई-हां मा यी द्वी ठिक बुना आपे नौनी दगड् ब्यो करी क जिंदगी मस्त ह्वेगी।

सासु
हा..... हा हा
जाणदु छौं मी, की तुम तीनी अपड़ी ब्वारीयों तें खुब प्यार करदा, मेरा लठ्यालों बात यन च की हमारा बामणों बोल्यूं छैं की बच्चा हूण से पैली शुरु का चार मैना गौं मा जैकी रैली जख मेरा चचा रैन्दा,

सुमीत
पर किलैं मा, गौं मा किलैं जै की रैंण

सासु

लठ्यालों हमारा परिवार तें योक श्राप च की अगर मेरी ब्येट्यून यख बच्चा जनी त् वौका नौन्यालों तें कुछ भी नखरू ह्वे सकदु । आज बटिन चार मैना तलक यौं तीनी व्येटियों तें गौं वाला घोर मा रैण पढ़लू |

पहला जमाई

त येमा परेशानी क्या च माजी, हम भी वख चली जौला और चार मैना तक मजा करला, ब्वारी जख तख हम...

दूसरा जमाई
हां रे आईडिया त बहुत अच्छू दीनी त्वीन, ये सैर मा रै की परेशान वेग्या हम, अब कुछ दिन गौं मा रौला मौज मनौला

सासु
तुम गणखणा कीलै नी, तु वैख तख क्वे नी जै सकदा ।
अर मैं यखी च तुम तीनों गैल। चार मासे त छुईं च । तैका बाद यी तीनी बौड़ी क यखी ऐ जौला ।

तीसरा जमाई 
ठीक च माजी अगरा हमरा नौनयालों बात च यो त करण पढलो...


गोदावरी अपणी तीनी ब्येटियों तें गों भेज देंदी

कुछ दिन बाद

पहला जमाई - मा बौत दिन बटीन मोमोंज नी खै, जरा मगवें द्या

सासु
क्या बतौण जवैं जी पल्ली त नौनी खर्चा दे देंदी छैं, किलें की वोंकी नौकरी छै, अब मैमा विकुल भी खर्चा नी ,अब कु देलू खर्चा

 दूसरा जमाई -
मां अभी त आपे ब्येटीयों तें बौणी के औण मा 3 मैंना बच्यां च ।

सासु
हम्म........
 वें त सोची सोची परेशान हुणु च में., स्वचणु छौं की भोल बटीन दूध भी बंद कर वे देंदू । अब दूदू वाला तें भी पैसा देंणा ले पैसा नी मैमा।

जमाई
ना माजी दूद बंद कर देला त मेरी चार बखते चाई क्या होलू ।। ये का बिना त मैं मरी जौलू।

सासु
क्या कन जमेई... और क्वी बाटु भी त नी दिखेंणु मैं..... पैसे नी बच्यां मैंम ।

 अब तीनों जमैयों को घर से खर्च मिलना बंद हो चुका था और तीनों जमाई. परेशान होने लगे थे, एक दिन तीनों जमाई बाजार
जाते हैं और बाहर निकालने के बाद

दूसरा जमाई -
यार बौत दीन बटी भैरा कुभलू खाणु नी खै जणी कब खैला हम भल्लू खाणु ।
पहला जमाई -
हमारी व्वारियों जाणा बाद त हम भिखारी जन हवेग्या यार।
कुछ भी वे जौं आज श्याम बक्त तलक मैंन त मोमो खाणें च यार ।
तीसरा जमाई
खीसा खाली च अर बडू हूंयूं मोमोज खाण वालू, कख बटीन औला पैसा।

दूसरा जमाई -
तो पार देख कम्प्यूटर मा काम करणा लै योंतें मनखी जरूरत च बल । भई मैंत जाणु च काम कन तब जे की श्याम बक्तों मोमो खाण कु जुगाण ह्वे सकलू ।

तीसरा जमाई
जा रे जा त्ये जन कैं क्वे काम नीं देंण वालू ।

पहला तीसरा
हम त घौर चलदा.... चल यार

विवेक तें काम मिल जांदू, और वो पूरा दिन कम्प्यूर मा काम करदू| श्याम बक्त विवेक द्वी हजार रुपया ल्ये की घौर औंदू अर अपड़ा खाण का वास्ता अच्छी चीज भी ल्ये की ओंदू,

वेकै देखी की अवतार अर समीता मन मा भी पैसा कमौण की इच्छा हूंदी ।

सासु
सुवेर सुबेर बिन ख्यां तेयार वै की कख?

विवेक

मां मेंते बहुत अच्छी जगा काम मिली । दिन मा काम करणा लै द्वी हजार और पक्की नौकरी मा ५० हजार तनखवा मिलली ।

सासु
अरे सच्ची या बहुत बढ़िया बात च जवें जी

 सुमित और अविनाश विवेक की तरक्की को देखकर परेशान हो जाते हैं और वह दोनों भी काम के तलाश में निकल जाते हैं कुछ दिन में उन्हें भी काम मिल जाता है अब गोदावरी के तीनों दामाद अच्छी खासी नौकरी करके अच्छा खासी तनख्वाह ले रहे थे ।

सासु
 एक दिन गोदावरी उन्हें अपने पास बुलाती है और कहती है
अवतार ' सुमीत और विवेक अब तुम तीनों खासाकाम लेते हो ।

सुमित
हां मा बोत मा जा ऊणु काम कन मा। जब महिना मा मोटी तन्खवा हाथ मां मिल्दी ।
अवतार
घोर मा रैकी, रोटी और खाणु बणौण पढ़णु छै मैंतें ।

सासु
हां लढ्यालों तुम तीनों बात त बिल्कुल ठी च, पर तुम तीनों व्वारी भी बौड़ी की घर औण वाली च ।

विवेक
मांजी अभी उथें औण मा यों मैना बच्यूं च, आपन बोली छे वीं चार मै ना पूरी हुणा बाद घर औला बल

हा हा हा... यन कुछ नी लढ्यालों में तब बस तुम तीनों तें कामकाजु बणौण चांदू छै, लड़का घोर बैठी की अपड़ी ब्वारियों कमैं खादं करव भलू लगदू I ये दुनिया मा सब्यों तें मैनत कन जरूरी च चाहे स्वो वैख हो फिर कज्याण,ताकी स्वो अपड़ी कुटुमदारी संभाल सके । गोदावरी बात सोणी के ऊंतीनों तें अपड़ी गलती पता चलदू अर गोदावरी ऊं तीनों तें सच बथै देंदी, की ऊकी तीनी ब्येटी ये शैर मा और कखी रैणा छा, श्याम बक्त ऊँ तीनी घर बौणी की ऐ जांदी । अब गोदावरी परिवार यो खुशहाल परिवार बाण जांदूं ।
 












अजयपाल (राजा): गढ़वाल के पंवारवंशी राजा



अजयपाल (1500-1548 ई.)तक 
गढ़राज्य की नींव अजयपाल (1500-1548 ई.)
अजयपाल महान् व्यक्तित्व के धनी थे। इन्होंने गढ़राज्य के बिखरे हुए प्रशानिक केन्द्रों को समीकृत करके सुदृश गढ़राज्य की नींव डाली थी। इनके व्यक्तित्व के विषय में मानसाह (1591-1611 ई. के कवि मंत्री रामायण प्रदीप के रचियता, भरत कवि का कहना है 'उनका नाम सुनते ही उनके शत्रु कंपित हो उठते थे। युद्ध में वह युद्धिष्ठर के समान स्थिर रहने वाला, गुणवानों के आश्रयदाता तथा गदाधारी भीम के समान बलशाली था । उससे युद्ध करने का साहस किसी में न था । इस प्रकरण में उसे दुर्योधन (जिससे युद्ध करना दुष्कर होता है) भी कहा जा सकता है। वह कुबेर के समान ऐश्वर्य सम्पन्न था। इस धरती पर विद्वानों से घिरा हुआ व देवताओं से घिरे इन्द्र के समान था। वह श्रीकृष्ण के समान बलप्रिय था अर्थात् जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण को अपने भ्राता बलराम से विशेष प्रेम था उसी प्रकार उसे भी अपने पुत्र बलराम से विशेष प्रेम था ।
 ' राहुल (गढ़वाल,  128-29) के अनुसार, "उत्तर में हिमशिखरों से लेकर दक्षिण मे चण्डी हरिद्वार तक तथा पश्चिम में बधानगढ़ी तक सारे गणराज्य का एकीकरण करने वाले नृपति की यह प्रशंसा सर्वथा उचित ही है । ' " वह एक विशाल राज्य का निर्माता ही नहीं, अपितु विशाल राजप्रसादों में देवालयों का निर्माता भी था ।
श्रीनगर में उसके द्वारा निर्मित कराये गये चार मंजिले प्रासाद के अवशेष, वर्षों तक उपेक्षित रहने के बावजूद भी 19वीं शताब्दि के प्रारम्भ तक अपनी गौरव गाथा सुनाने के लिए विद्यमान थे। प्रासाद के परिसर के अन्तराल में बने भव्य स्नानागार, जिन्हें 4 मील से भी अधिक दूरी से सुरंग मार्ग से लाये गये जल से पूरित किया जाता था, सभी कुछ तो उस महान् निर्माता के व्यक्तित्व का प्रतीक था। जो सन् 1903 के भूकम्प में ध्वस्त हो गया। इसी प्रकार उसने श्रीनगर, राणीहाट तथा देवलगढ़ में भव्य देवालयों का भी निर्माण कराया था।
उत्तराखंड सरकार उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वेलनट मिशन शुरू करनें जा रहीं है

क्या है वेलनट मिशन योजना 👇
स्थानीय लोगों की आजीविका बढ़ाने के लिए अखरोट, बांस और बांज जिसे पेड़ों की प्रजातियां को बढ़ावा देने हेतू उत्तराखंड सरकार द्वारा नई योजना

 उत्तराखंड में वन संपदा को लोगों की आजीविका से जोड़ते हुए नए प्रयोग करने की तैयारी है इसमें उच्च हिमालय क्षेत्र, और

साथ ही मैदानी इलाकों में इस योजना पर काम करने की तैयारी हो रही है,  इस योजना में अखरोट बांस, बांज, सागोंन और पापुलर पेड़ों की प्रजातियां को बढ़ावा देने की बात कही गई है।

 उच्च हिमालय क्षेत्र में उद्यान विभाग के साथ मिलकर अखरोट उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए वैलेंट मिशन के तहत काम किया जाएगा।

एक अनुमान के अनुसार राज्य की आय की वानिकी क्षेत्र में हिस्सेदारी 2.5 और 3.5% तक है। सरकार चाहती है कि वानिकी क्षेत्र का उपयोग करते हुए इस वन पंचायत और लोगों की आजीविका से जोड़ा जाए।

 उत्तराखंड अखरोट उत्पादन के लिए अनुकूलित है।
 उत्तराखंड राज्य अखरोट उत्पादन में देश में जम्मू कश्मीर के बाद दूसरे नंबर पर आता है। यह अखरोट उत्पादन के लिए अनुकूलित परिस्थितियों है इसकी बावजूद भी बीते सालों में राज्य में इसका उत्पादन घटा ही है, उत्तराखंड राज्य में प्रतिवर्ष करीब 18 से 20000 मेट्रिक टन अखरोट का उत्पादन होता है। और इस राज्य में नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर,पिथौरागढ़, चंपावत, देहरादून, पौड़ी,टिहरी,चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी की ऊंचाई वाले क्षेत्र में  उत्पादन के अपार संभावना है यही वजह है कि सरकार अब अखरोट उत्पादन को मिशन मोड पर लाने की तैयारी में जुटी हुई है 
How to talk about Time in Garhwali language?
गढ़वाली भाषा में समय से जुड़ी बातें कैसे करें?

हिंदी  गढ़वाली   English
समय  बक्त / टैम   Time
 सुबह की धुप लगना  घाम औण, 
धाम लगण
 sunshine 
 धूप छिपने का वक्त  घाम अछ्याण,
ब्याखुनी बक्त 
 Sunset
सुबह  सुबेर /प्रभात्  Morning 
दोपहर  दुफेर, दुफ़री, पाछ  Afternoon
 रात होने से पहले का वक़्त / सायं काल  मुमुक, रुमकी बक्त   Sunset
भोर  फजल /रातब्याणी   Early Morning
जल्दी  सन्कवाल  Hurry Up
कल (आने वाला ) भोल   Tomorrow 
परसों ( कल  के बाद का दिन ) परस्यो   After Day Tomorrow
 कल (बीता हुआ) ब्याली    Yesterday
 बीते हुए कल से पहले का दिन  परसी   Before Day Yesterday 
साल  बरस  Year 
चार धाम यात्रा : उत्तराखंड के चार पवित्र मंदिरो की यात्रा जानते है विस्तार पूर्वक 
Title: Char Dham Yatra: Uttarakhand ke Chaar Pavitra Mandiro ki Yatra
Char Dham Yatra: Uttarakhand ke Chaar Pavitra Mandiro ki Yatra


Introduction:
Char Dham Yatra ka matlab hota hai chaar pavitra mandiro ki yatra jo Hindu dharm ke liye bahut mahatvapoorn hai. Char Dham Uttarakhand mein Garhwal parvat shreni mein sthit chaar pavitra mandir hain - Yamunotri, Gangotri, Kedarnath aur Badrinath. Yah yatra bhagwan ke ghar jaane ka safar hai aur isse sath hi is kshetra ki prakriti ki khubsurti aur sanskriti ka anubhav bhi milta hai

परिचय :
चार धाम यात्रा का मतलब होता है चार पवित्र मंदिरो की यात्रा जो हिन्दू धर्म के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.  चार धाम उत्तराखंड में गढ़वाल पर्वत श्रेणी में स्थित चार पवित्र मंदिर हैं - यमुनोत्री , गंगोत्री , केदारनाथ और बद्रीनाथ . यह यात्रा भगवान के घर जाने का सफर है और इससे साथ ही इस क्षेत्र की प्रकृति की खूबसूरती और संस्कृति का अनुभव भी मिलता है 


Route:
Char Dham Yatra ki yatra uttar se shuru hoti hai. Yatra Yamunotri se shuru hoti hai jo samudra se 3293 mitar ki oonchai par sthit hai. Wahan se yatra Gangotri ki or aage badhti hai jo 3100 mitar ki oonchai par sthit hai. Kedarnath, jo samudra se 3583 mitar ki oonchai par sthit hai, agla stop hai. Ant mein, yatra Badrinath par samapt hoti hai jo samudra se 3133 mitar ki oonchai par sthit hai.

जाने का रास्ता Route:
चार धाम यात्रा की यात्रा उत्तर से शुरू होती है . यात्रा यमुनोत्री से शुरू होती है जो समुद्र से 3293 मीटर की ऊंचाई पार स्थित है . वहां से यात्रा गंगोत्री की ओर आगे बढ़ती है जो समुद्र तल से 3100 मीटर की ऊंचाई पार स्थित है . केदारनाथ , जो समुद्र से 3583 मीटर की ऊंचाई पार स्थित है , अगला stop अंत में यात्रा बद्रीनाथ पर समाप्त होती है जो समुद्र से 3133  मीटर की ऊंचाई पार स्थित है .

Mode of Transportation:
Char Dham Yatra ke liye yatra ke upriyata aur budget ke anusar bhinn-bhinn prakar ke transportation modes upalabh hai. Sabse prachlit transportation mode sadak dwara hai. Sadak marg achhe tarike se jodte hue aur yatra ke liye alag-alag bus, taxi aur private vahan uplabdh hai. Lekin, sadak yatra parvat shreni ki pathari aur sankeern sadakon ke karan thakaan dayak aur chunautipurn ho sakta hai.

   Ek aur lokpriya mode of transportation helicopter se hai. Helicopter seva Dehradun se uplabdh hai, aur yah safar ko kam samay mein sampann karne ka suvidha pradan karta hai. Helicopter yatra aam taur par 2-3 din ka hota hai aur vah himalaya ki ashcharyajanak havaai nazare bhi pradan karta hai.

Trekking un logon ke liye ek aur vikalp hai jo sampoorn yatra ki paryatanik anubhav ke shaukin hote hai aur kshetra ki prakritik khubsurti ko sakshat karana chahte hai. Trekking route chunautipurn hai aur yah kuchh sharirik swasth aur sahanubhuti ki ek nishchit star ki avashyakta hai.


Best Time to Visit:
Char Dham Yatra ke liye sabse achha samay April se November tak hai. Is samay ke mausam yatra ke liye suvidha janak aur anukul hai. Varsha ritu, jo July se September tak chalti hai, bahut jyada baarish aur bhumi sanchalan ke karan chunautipurn ho sakta hai. Isliye, varsha ritu mein yatra se bache jane ki salah di jati hai.

Significance of Char Dham Yatra:
Char Dham Yatra ke kshetra ko moksh dham ke roop mein jaana jata hai aur yah yatra hindu dharm ke liye bahut mahatvapoorn hai. Is yatra ke prati logon ke bhakti aur astha ka aadarsh prakat hota hai. Char Dham Yatra mein char pavitra mandir hain jo alag-alag hindu deviyon se sambandhit hai.

Yamunotri ke mandir mein yamuna nadi ke srot ke roop mein devi yamuna ki upasana ki jaati hai. Gangotri ke mandir mein devi ganga ki puja ki jaati hai. Kedarnath ke mandir mein bhagwan shiv ki upasana ki jaati hai aur Badrinath ke mandir mein bhagwan vishnu ki puja ki jaati hai.

Char Dham Yatra ke mandir sabhi mandiro ki katha evam puran ke anusar bahut prachin hai aur isiliye in mandiro ki mukhyaatah hindu dharm se sambandhit hai. Is yatra mein kshetra ki prakritik khubsurti ko bhi dekha jaa sakta hai. Yatra ke dauraan logon ko Himalaya ki shandaar parvat shreni ke nazare, nadiya aur pahadi ke mausam ka aanand prapt hota hai.

Char Dham Yatra ke dauran kshetra ki sanskriti evam aitihasik paryatan ka anubhav bhi kiya jaa sakta hai. Kshetra mein sthit alag-alag temple, ashram, aur prakritik sthal paryatanik sthal ke roop mein bhi jana jaata hai.

Yatra kaafi lambe samay tak chalti hai aur iske liye sahi tayyari aur sahi saman ki avashyakta hoti hai. Isliye, yatra se pahle sahi tayyari ke saath-saath jankari prapt karna bhi jaruri hai.

Char Dham Yatra ek aisa safar hai jo aapke man ko aur aapke sharir ko dono tarike se shanti aur aanand pradan karta hai. Yah yatra hindu dharm ke liye bahut mahatvapoorn hai aur iske dauraan aapko kshetra ki prakritik khubsurti aur sanskriti ka anubhav bhi prapt hota hai.

Char Dham Yatra ki shuruaat har saal aprail ya may ke mahine mein hoti hai aur yah yatra 6 mahine tak chalti hai. Is yatra ke liye aapko Uttarakhand ke dehradun ya rishikesh shahar se shuru karna hota hai aur yatra ke dauraan aapko bhojan, basaai aur anya suvidhaye bhi uplabdh hoti hai.

Char Dham Yatra ko poori tarah se purushon ke liye hi nahi balki mahilao ke liye bhi tayyar kiya gaya hai. Yatra mein mahilao ke liye alag-alag dharmik sthal aur ashram uplabdh hai jaha unhe apni saari jarurto ko pura karne ki suvidha uplabdh hoti hai.

Is yatra ke dauraan yatriyon ko thoda sa dhyan rakhna bhi bahut avashyak hai. Char Dham Yatra ke mandiro mein pravesh ke liye alag-alag niyam hote hai, isliye aapko sahi jankari prapt kar lena chahiye. Iske saath hi, yatra ke dauraan aapko barish, thand aur anya prakritik dushkarmo ka bhi saamna karna pad sakta hai, isliye sahi tayyari aur anubhav ki avashyakta hai.

Char Dham Yatra ke dauraan aap apne man ko aur sharir ko shanti aur aanand pradan karne ke saath-saath apne dharmik aur sanskritik tatvo ko bhi aur adhik shakti se jod sakte hai. Is yatra mein apne jeevan ke ek naye anubhav ko paane ka mauka milta hai aur aap apni astha ko bhi adhik majbooti se jod sakte hai.

Ant mein- Char Dham Yatra ek aisa safar hai jo aapke man ko aur aapke sharir ko dono tarike se shanti aur aanand pradan karta hai. Yah yatra hindu dharm ke liye bahut mahatvapoorn hai aur iske dauraan aapko kshetra ki prakritik khubsurti aur sanskriti ka anubhav bhi prapt hota hai


अंत मे - चार धाम यात्रा एक ऐसा सफर है जो आपके मन को और आपके शरीर को दोनों तरीके से शांति और आनंद प्रदान करता है . यह यात्रा हिन्दू धर्म के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और इसके दौरान आपको क्षेत्र की प्राकृतिक खूबसूरती और संस्कृति का अनुभव भी प्राप्त होता है 

UTTARAKHAND GK UPDATES


BARTWAL TOPIC
बर्त्वाल क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण 🙏
 

BARTWAL बर्त्वाल क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण


  • कौन होते है बर्त्वाल?
  • इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
  • बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं?
  • क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही?
  • यह किस के उपासक /पूजा /आराध्य करते हैं
  • बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द

कौन होते है बर्त्वाल
उत्तराखंड मे काफ़ी सारी जातियाँ होती हैं उन्हीं जाती यानी कस्ट मे एक नाम आता है बर्त्वाल जाती का,बर्त्वाल एक पहाड़ी क्षत्रिय जाति है यह राजवंश मे इस लिए भी प्रमुख मानी जाती है क्यों की बर्त्वाल जाती के लोग काफ़ी साहसी निडर और निर्भीक होते थे इस लिए उत्तराखंड मे बर्त्वाल वंश से हार एक परिचत होगा

इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
  बर्त्वाल 9 शताब्दी ई० में धारानगरी–उज्जैन से आकर गढ़वाल में बस गए थे। इनका पहला गांव रडुवा–चंदनीखाल (उल्काखाल) जो गढ़वाल के इतिहास में बर्तगढ के नाम से जाना जाता था कालांतर में खदेड़ पट्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ, नेपाल के गोरखाली आक्रमण के दौरान बर्तवाल बहादुरों ने आक्रमणकारियो को हराकर वहाँ से खदेड़ा था जिसके कारण उस क्षेत्र का नाम खदेड़ पट्टी पड़ा ।पूरे गढ़वाल क्षेत्र में केवल खदेड़ में ही गोरखे १० बरसों के अपने राज में कब्जा नहीं कर सके क्योकि बर्तवाल बीरों ने उनको हर बार बुरी तरह से पराजित किया। और आज इसी खदेड पट्टी से ये रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी और उत्तरकाशी और पौड़ी के कुछ क्षेत्रों में बस गए।


बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं
यह परमार राजवंश की एक उपशखा है जो बाद में अपभ्रंश होकर पंवार हो गई अपने प्रण को पूरा करने के विशेष गुण के फलत: इनको बर्त्वाल उपनाम से जाना जाने लगा जो कालांतर में इनकी प्रमुख जाति नाम हो गया, यानी परमार राजवंश के दो गुट हो गए थे. पंवार राजवंश और बर्त्वाल राजवंश.

क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही हैं
यह बात सामन्यत: देखीं जाती है की हम बर्त्वाल और बर्थवाल जाती को एक ही समझें की भूल किया करतें हैं उत्तराखंड के पौड़ी जिले मे रहने वाले बर्थवाल और बर्त्वाल जाती का आपस मे कोई तालमेल नहीं है पौड़ी मे जन्मे बर्थवाल जाती एक ब्राह्मण जाति है और बर्त्वाल एक ठाकुर यानी राजवंशी जाती है जिन्हे हम छत्रिय कहते हैं.कई बार लोग दोनो जातियों एक समझने लगते हैं.

यह किस कि पूजा /आराध्य करते हैं
बर्त्वालो की इस्ट देवी दक्षिण कलिंका भवानी है आज भी इनका मंदिर बर्त्वालो के प्रथम गांव रडुआ में है और कई जगह इनकी पूजा राजराजेश्वरी देवी के रूप में भी जाती हैं। बर्त्वाल लोग अपने नाम के आगे "ठाकुर" और नाम और जाति के बीच में "सिंह "का उपयोग होता है। इनका गोत्र भारद्वाज है। यह राजराजेश्वरी देवी के उपासक रहे है और इन्ही को अपनी ईस्ट यानी कुल देवी के रूप मे पूजते हैं 


 बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द
बर्त्वाल जाती हमेशा ही गढ़वाली भाषा का प्रयोग करती रही है है और आज भी उनके वंशज गढ़वाली भाषा का प्रयोग ही अपनी भाषा मे करते हैं लेकिन ये हार एक वंश मे होता है की कुछ शब्द थोड़ा अलग होते ही है तो इसमें बर्त्वालो के वंश में सबसे अलग यह है की ये अपने माता पिता को "जिया–बबाजी" या जिया–पिताजी",ससुर को "दीवान जी"और सास को "जी" कहकर बुलाते है,बर्त्वालो में "जदेसा" अभिवादन के रूप मे उपयोग किया जाता है,जो पहले गढ़वाल राजवंश के लोग भी किया करते थे।

 

 बर्त्वाल जाती के प्रसिद्ध व्यक्तियों पर एक लेख
  •  जसू बर्त्वाल और पंचमू बर्त्वाल
  •  भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल
  •  भीमसेन बर्तवाल
  •  ठाकुर धन सिंह बर्तवाल
  •  स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)
  •  चंद्र कुंवर बर्तवाल

जसू बर्त्वाल और पंचमू बर्त्वाल –ये दोनो ही प्रसिद्ध योगी रहे हैं इनका कई बार भैरव जागर, नरसिंग जगरो में इनका जिक्र आता है लेकिन इनके बारे में उपयुक्त जानकारी नहीं है।

भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल–ये दोनो भाई जिन्हे बर्तवाल बंधुओ के नाम से जाना जाता था वह राजा महिपति शाह के सेनापति थे जिन्होंने गढ़वाल की सीमा को दक्षिणी तिब्बत (दाबा गढ़)को विजित कर उस राज्य को राजा के अधीन कर वहा का प्रशासन संभाला। कुछ सालो बाद वहा दाबा के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। आज भी बर्त्वाल बंधुओ की तलवारे दाबा के थोलिंग मठ में विजय समारक के रूप में रखी हुई हैं जिनकी पूजा आज तक होती है।

भीमसेन बर्तवाल–ये मुगल दरबार में 1658–1678 ई० तक मनसबदार के पद पर नियुक्त थे,इनको 1000सवार और 600 जातियों का मनसब मिल रखा था बाद में इन्होंने मदन सिंह भंडारी ने मिल कर पंचभयाखाल में पांच भाई कठैतो को उनकी "कठैतगर्दी" के कारण खत्म किया ,इनको खत्म करने की योजना पुरिया नैथानी ने बनाई थी , भीमसेन की बहन महारानी बर्तवाली जो कि फतेहपति शाह की 7 साल तक संरक्षिका रही थी उस समय तक रानी बर्तवाली और रानी सिरमौरी ने ही गढ़वाल का शासन चलाया।

ठाकुर धन सिंह बर्तवाल–ये तल्ला नागपुर के सतेरा स्युपुरी गांव के मालगुजार हुआ करते थे।ये भगवान बद्रीनाथ के बड़े भक्त थे इनके द्वारा भगवान बद्रीनारायण की सुप्रसिद्ध आरती “पवन मंद सुगंध शीतल ” सन 1881 इ० में लिखी गई थी। इन्ही के गांव में और भी कई अन्य प्राचीन पांडुलिपी मिली है जिनमे गढ़वाल के राजवंश,आयुर्वेद,गढ़वाल के अन्य इतिहासो के बारे में जानकारी मिलती है

स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)–इनका जन्म 1885 में तल्ला नागपुर के चमस्वाड़ा गांव में हुआ था,ये जन्म से ही अंधे पैदा हुए थे इन्हें आधुनिक रुद्रप्रयाग का प्रणेता माना जाता है, इन्होंने रुद्रप्रयाग में 1944 में मिडिल स्कूल की स्थापना जो कि बाद में राजकीय इंटर कॉलेज, संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना, चिकित्सालय,पशु चिकित्सालय निर्माण, सुरंग निर्माण, गुलाबराय मैदान, धर्मशाला के निर्माण आदि जनसरोकारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर महाराज जी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

चंद्र कुंवर बर्तवाल–इनका जन्म 20 अगस्त 1919 में मालकोटी * पट्टी तल्ला नागपुर,रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड, भारत में हुआ था। ये हिंदी के कवि थे जिन्हे हिंदी का कालिदास भी कहा जाता है,प्रकृति के चितेरे कवि, हिमवंत पुत्र बर्त्वाल जी अपनी मात्र 28 साल की जीवन यात्रा में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा कर अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गये। 1947 में इनका आकस्मिक देहान्त हो गया।

इन्हों ने हिंदी में कई प्रसिद्ध रचनाएं की जैसे–
  1. नंदिनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  2. मेघकृपा / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल                            
  3. पयस्वनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  4. काफ़ल पाकू / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  5. रैमासी / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  6. हिमशृंग / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  7. मैकाले के खिलौने / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  8. उस दिन के बादल / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल इत्यादि ।                         
    इसके अतिरिक्त गढ़वाल के प्रथम मानचित्रकार स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह बर्त्वाल, जिन्हें मानचित्र बनाने पर पुरुस्कार स्वरूप'गोल्ड मैडल' से पुरस्कृत किया गया परन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। एवं वर्तमान समय में चन्द्रकुंवर बर्त्वाल शोध संस्थान देहरादून के संस्थापक सचिव डाक्टर योगंबर सिंह बर्त्वाल जी अपने अथक प्रयास से पिछ्ले चालीस सालों से कविवर चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के व्यक्तिव एवं कृतित्व को उजागर करने के महायज्ञ में पूरे मनोयोग से तल्लीन हैं। कविवर को जनमानस के बीच जिंदा रखने का उनका भगीरथ प्रयास आज भी जारी है, जिसमें अब तक उन्होंने बारह लोगों को विषय पर पी एच डी करवाई, उत्तराखंड के विभिन्न स्थलों पर सात से अधिक कविवर की मूर्तियों को स्थापित किया एवं हिंदी विषय के पाठ्यक्रम में भी हिमवंत कवि की रचनाओं को समावेशित करने का अभूतपूर्व कार्य किया। उपर्युक्त सभी कर्मयोगी मनीषीयो से भावी पीढ़ी कुछ सीख ले कर प्रेरित होगी इसी ध्येय एवं विश्वास के साथ सबको सादर प्रणाम । 

UTTARAKHAND GK UPDATES
How to write Garhwali song Garhwali gana Kaise likhen गढ़वाली गाना कैसे लिखें 





How to write Garhwali song Garhwali gana Kaise likhen गढ़वाली गाना कैसे लिखें 


1.एक विषय चुनें:
उस थीम या संदेश पर निर्णय लें जिसे आप अपने गीत में व्यक्त करना चाहते हैं। यह प्यार, प्रकृति, संस्कृति या व्यक्तिगत अनुभव से कुछ भी हो सकता है।


2.एक राग बनाएँ:
उस राग या धुन के बारे में सोचें जिसे आप अपने गीत के लिए उपयोग करना चाहते हैं। एक आकर्षक राग होना महत्वपूर्ण है जो श्रोताओं के साथ प्रतिध्वनित हो।


3.लिखना शुरू करें:
गीतों की कुछ पंक्तियों के साथ शुरुआत करें जो आपके विषय के सार को पकड़ती हैं। सरल भाषा का प्रयोग करें और जटिल शब्दों या वाक्यांशों से बचने का प्रयास करें।


4.अपने गीतों को परिष्कृत करें:
एक बार जब आप पहला मसौदा लिख ​​लें, तो इसे ध्यान से देखें और आवश्यक परिवर्तन करें। शब्दों के प्रवाह और गीत की लय पर ध्यान दें।

5.इमेजरी का प्रयोग करें:
 गढ़वाली एक ऐसी भाषा है जिसमें प्रकृति और परिदृश्य के लिए एक समृद्ध शब्दावली है। गढ़वाल क्षेत्र की सुंदरता को जगाने वाले अपने गीतों में ज्वलंत कल्पना और रूपकों का उपयोग करने का प्रयास करें।


6.तुकबंदी योजना पर ध्यान दें:
 गढ़वाली गाने अक्सर एक तुकबंदी पैटर्न का उपयोग करते हैं, इसलिए सुनिश्चित करें कि आपके गीत एक सुसंगत तुकबंदी योजना का पालन करते हैं।


7.प्रतिक्रिया प्राप्त करें:
 एक बार जब आप गीत लिखना समाप्त कर लें, तो प्रतिक्रिया के लिए इसे दूसरों के साथ साझा करें। इससे आपको अपना काम परिशोधित करने और आवश्यक परिवर्तन करने में मदद मिलेगी


8.उस्तादों से सीखें: एक महान गढ़वाली गीत लिखने के लिए, स्थापित गढ़वाली गायकों और गीतकारों के काम का अध्ययन करना आवश्यक है। उनके संगीत को सुनें और उनके गीतों को पढ़ें ताकि यह समझ सकें कि वे अपने गीतों को कैसे तैयार करते हैं।


 9.रोजमर्रा की भाषा का प्रयोग करें:
गढ़वाली एक ऐसी भाषा है जो जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों द्वारा बोली जाती है। इसलिए, रोजमर्रा की भाषा का उपयोग करना महत्वपूर्ण है जिससे हर कोई संबंधित हो सके। अत्यधिक तकनीकी या अकादमिक भाषा का उपयोग करने से बचें, जो शायद हर किसी से परिचित न हो।

10.संस्कृति के प्रति सच्चे रहें:
गढ़वाली संगीत की एक अनूठी सांस्कृतिक पहचान है जो गढ़वाल क्षेत्र की परंपराओं और मूल्यों में निहित है। एक गीत लिखने के लिए जो श्रोताओं के साथ प्रतिध्वनित होता है, इस सांस्कृतिक पहचान के प्रति सच्चा रहना और क्षेत्र के इतिहास, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को दर्शाने वाले तत्वों को शामिल करना महत्वपूर्ण है।

11.अन्य संगीतकारों के साथ सहयोग करें:
गीत लिखना एक सहयोगी प्रयास हो सकता है, और अन्य संगीतकारों के साथ काम करने से आपको नए विचारों को सामने लाने में मदद मिल सकती है। अन्य गढ़वाली संगीतकारों के साथ सहयोग करने से भी आपको भाषा और संस्कृति के बारे में अधिक जानने में मदद मिल सकती है।

 12.नियमित रूप से अभ्यास करें:
गीत लिखना एक कौशल है जिसके लिए अभ्यास और समर्पण की आवश्यकता होती है। हर दिन लिखने की आदत डालें, भले ही वह कुछ पंक्तियाँ ही क्यों न हों। समय के साथ, आप गढ़वाली में खुद को अभिव्यक्त करने और अपने दर्शकों के साथ मेल खाने वाले यादगार गीतों को तैयार करने में बेहतर होंगे