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अजयपाल (राजा): गढ़वाल के पंवारवंशी राजा
अजयपाल (1500-1548 ई.)तक
गढ़राज्य की नींव अजयपाल (1500-1548 ई.)
अजयपाल महान् व्यक्तित्व के धनी थे। इन्होंने गढ़राज्य के बिखरे हुए प्रशानिक केन्द्रों को समीकृत करके सुदृश गढ़राज्य की नींव डाली थी। इनके व्यक्तित्व के विषय में मानसाह (1591-1611 ई. के कवि मंत्री रामायण प्रदीप के रचियता, भरत कवि का कहना है 'उनका नाम सुनते ही उनके शत्रु कंपित हो उठते थे। युद्ध में वह युद्धिष्ठर के समान स्थिर रहने वाला, गुणवानों के आश्रयदाता तथा गदाधारी भीम के समान बलशाली था । उससे युद्ध करने का साहस किसी में न था । इस प्रकरण में उसे दुर्योधन (जिससे युद्ध करना दुष्कर होता है) भी कहा जा सकता है। वह कुबेर के समान ऐश्वर्य सम्पन्न था। इस धरती पर विद्वानों से घिरा हुआ व देवताओं से घिरे इन्द्र के समान था। वह श्रीकृष्ण के समान बलप्रिय था अर्थात् जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण को अपने भ्राता बलराम से विशेष प्रेम था उसी प्रकार उसे भी अपने पुत्र बलराम से विशेष प्रेम था ।
' राहुल (गढ़वाल, 128-29) के अनुसार, "उत्तर में हिमशिखरों से लेकर दक्षिण मे चण्डी हरिद्वार तक तथा पश्चिम में बधानगढ़ी तक सारे गणराज्य का एकीकरण करने वाले नृपति की यह प्रशंसा सर्वथा उचित ही है । ' " वह एक विशाल राज्य का निर्माता ही नहीं, अपितु विशाल राजप्रसादों में देवालयों का निर्माता भी था ।
श्रीनगर में उसके द्वारा निर्मित कराये गये चार मंजिले प्रासाद के अवशेष, वर्षों तक उपेक्षित रहने के बावजूद भी 19वीं शताब्दि के प्रारम्भ तक अपनी गौरव गाथा सुनाने के लिए विद्यमान थे। प्रासाद के परिसर के अन्तराल में बने भव्य स्नानागार, जिन्हें 4 मील से भी अधिक दूरी से सुरंग मार्ग से लाये गये जल से पूरित किया जाता था, सभी कुछ तो उस महान् निर्माता के व्यक्तित्व का प्रतीक था। जो सन् 1903 के भूकम्प में ध्वस्त हो गया। इसी प्रकार उसने श्रीनगर, राणीहाट तथा देवलगढ़ में भव्य देवालयों का भी निर्माण कराया था।

