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UTTARAKHAND GK Pdf
क्या है उत्तराखंड भू क़ानून, क्यों जरुरी हो गया है उत्तराखंड का भू क़ानून
उत्तराखंड में आकर कोई भी कितनी भी जमीन अपने नाम से खरीद सकता है, पहाड़ी राज्यों में सस्ते दामों पर जमीन खरीदकर उसे बाहरी लोग अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। लोगों का आरोप है कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बाहरी हस्तक्षेप से यहां की संस्कृति को बड़ा खतरा है, इसीलिए अब एक सख्त भू कानून की मांग छिड़ गई है।
उत्तराखंड के पड़ोसी राज्य हिमाचल में कानूनी प्रावधानों के चलते कृषि भूमि की खरीद लगभग नामुमकिन है। सिक्किम में भी भूमि की बेरोकटोक बिक्री पर रोक के लिए बीते वर्ष ही कानून बना है। मेघालय का कानून भी भूमि बिक्री पर पाबंदी लगाता है। जब दूसरे हिमालयी राज्यों में कानून हैं तो फिर उत्तराखंड में क्यों नहीं?
पहाड़ में भूमि खरीदने के लिए बाहरी राज्यों के लोगों की बाढ़ सी आ गई। दूरदराज गांवों में भी बाहरी प्रदेश के लोगों की ओर से जमीनें खरीदने के प्रयास किए जा रहे हैं। जो पहाड़ के सामाजिक संस्कृति व बोली-भाषा के लिए खतरे का कारण बन सकता है।
सख्त भूमि कानून के अभाव में उत्तराखंड के जंगल भी खतरे में हैं। पलायन का कारण भी उत्तराखंड में यही रहा कि खेती से वहां रोजगार के खास प्रयास नहीं हुए. उत्तराखंड में इन्हीं कारणों से गांव बचाओ यात्रा जैसे आंदोलन भी हो रहे हैं।
एक नज़र हिमांचल के भू-कानून पर
हिमाचल को 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और राज्य बनने के अगले ही साल भूमि सुधार कानून लागू हो गया।
धारा 118 के तहत कोई भी बाहरी व्यक्ति कृषि की जमीन निजी उपयोग के लिए नहीं खरीद सकता।
लैंड सीलिंग एक्ट में कोई भी व्यक्ति 150 बीघा जमीन से अधिक नहीं रख सकता।
गैर हिमाचली नागरिक को यहां जमीन खरीदने की इजाजत नही । कमर्शियल प्रयोग के लिए आप जमीन किराए पे ले सकते हैं।
वर्ष 2007 में धूमल सरकार ने धारा-118 में संशोधन किया और कहा कि बाहरी राज्य का व्यक्ति, जो हिमाचल में 15 साल से रह रहा है, वो यहां जमीन ले सकता है। इसका बड़ा विरोध हुआ और बाद में अगली सरकार ने इसे बढ़ा कर 30 साल कर दिया।
ये था हिमाचल प्रदेश का भू कानून, क्या इसी आधार पर उत्तराखंड में भू कानून लागू होना चाहिए।

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