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उत्तराखंड जीके अपडेट्स uttarakhand gk
Nanda Raaj Jaat
नन्दा राजजात यात्रा
उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ को एक करने वाला नंदा राजजात उत्तराराखंड का एक सबसे बड़ा धार्मिक आस्था का प्रीतक माना जाता है ।इस नंदा राज जात को नंदा की राजकीय यात्रा भी कहा जाता है।
नंदा का अर्थ माँ पार्वती से और जात का अर्थ है यात्रा, यह विश्व की सबसे लंबी पैदल और दुर्गम यात्रा है जो 280 किलोमीटर की है , यह यात्रा नौटी से प्राम्भ होती हुई 19 पड़ाव को पार करती हुई होमकुंड तक जाती है
इस यात्रा का प्रारंभ कब शुरू हुआ यह किसी के पास पुख्ता जानकारी नहीं है , कुछ का कहना है कि 9वीं शताब्दी में राजा कनकपाल इसको शुरू करना चाहते थे और बाद में गढ़वाल के नरेश अजयपाल ने गढ़वाल को एक धार्मिक रूप में बांधे रखने के लिए प्रति 12 वर्ष में नंदा देवी की जात महोत्सव करवाने का शुभारंभ किया था। यह ना केवल उत्तराखंड बल्कि देश - विदेश से भी यात्रा में शामिल होने के लिए श्रद्धालु बढ़ - चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। इस लिए इसे विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा कहा जाता है। नंदा उत्तराखंड के शासकों की कुलदेवी के रूप में पूजित होती रही है गढ़वाल के शासकों में इनकी मान्यता एक कुल देवी राजराजेश्वरी के रूप में रही है।
चौसिंगा - इस यात्रा का एक मुख्य अंश चार सिंगों वाला नर भेड़ होता है , जिसे चौसिंगा मेंडू या खाडू भी कहा जाता है ।
12 वर्ष में यह किसी बकरवाल (पाल्सी) बकरी पलकों के यहाँ जन्म लेता है और इसके जन्म के वक़्त ही माता के किसी भक्त को इसके होने का सुस्वप्न होता है। इसके बाद खाडू की छानबीन की जाती है की वह किस छेत्र या गाँव के बकरवाल के यहाँ जन्म हुआ है। इसी के साथ ही राजजात की तैयारी भी शुरू हो जाती है। यह पूरे रास्ते बिन बंधे हुए ही चलता रहता है। इसे लाल पीले वस्त्रो से सजाया जाता है । और इसे कमर में माता के लिए समौण (उपहार )भेजा जाता है । यात्रा के अंतिम पड़ाव होमकुंड के बुग्याल तक सबके साथ चलता है और इसके बाद यह अकेला ही कैलाश की और चल पड़ता है । और बुग्याल और कोहरे में कही खो जाता है।। कहा जाता है कि नन्दा देवी जी भी इसी खाडू के साथ कैलास जाती हैं।
12 वर्ष में यह किसी बकरवाल (पाल्सी) बकरी पलकों के यहाँ जन्म लेता है और इसके जन्म के वक़्त ही माता के किसी भक्त को इसके होने का सुस्वप्न होता है। इसके बाद खाडू की छानबीन की जाती है की वह किस छेत्र या गाँव के बकरवाल के यहाँ जन्म हुआ है। इसी के साथ ही राजजात की तैयारी भी शुरू हो जाती है। यह पूरे रास्ते बिन बंधे हुए ही चलता रहता है। इसे लाल पीले वस्त्रो से सजाया जाता है । और इसे कमर में माता के लिए समौण (उपहार )भेजा जाता है । यात्रा के अंतिम पड़ाव होमकुंड के बुग्याल तक सबके साथ चलता है और इसके बाद यह अकेला ही कैलाश की और चल पड़ता है । और बुग्याल और कोहरे में कही खो जाता है।। कहा जाता है कि नन्दा देवी जी भी इसी खाडू के साथ कैलास जाती हैं।
छतोली -छतोली का अर्थ छतरीनुमा आ
कृति से है जो दिखती छतरी जैसी है लेकिन यह असल में रिंगाल और भोज पत्रों द्वारा तैयार की जाती है इस पर भी लाल या पीले रंग का वस्त्र बांध दिया जाता है।
कृति से है जो दिखती छतरी जैसी है लेकिन यह असल में रिंगाल और भोज पत्रों द्वारा तैयार की जाती है इस पर भी लाल या पीले रंग का वस्त्र बांध दिया जाता है।



