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BARTWAL TOPIC
बर्त्वाल क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण 🙏
 

BARTWAL बर्त्वाल क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण


  • कौन होते है बर्त्वाल?
  • इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
  • बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं?
  • क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही?
  • यह किस के उपासक /पूजा /आराध्य करते हैं
  • बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द

कौन होते है बर्त्वाल
उत्तराखंड मे काफ़ी सारी जातियाँ होती हैं उन्हीं जाती यानी कस्ट मे एक नाम आता है बर्त्वाल जाती का,बर्त्वाल एक पहाड़ी क्षत्रिय जाति है यह राजवंश मे इस लिए भी प्रमुख मानी जाती है क्यों की बर्त्वाल जाती के लोग काफ़ी साहसी निडर और निर्भीक होते थे इस लिए उत्तराखंड मे बर्त्वाल वंश से हार एक परिचत होगा

इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
  बर्त्वाल 9 शताब्दी ई० में धारानगरी–उज्जैन से आकर गढ़वाल में बस गए थे। इनका पहला गांव रडुवा–चंदनीखाल (उल्काखाल) जो गढ़वाल के इतिहास में बर्तगढ के नाम से जाना जाता था कालांतर में खदेड़ पट्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ, नेपाल के गोरखाली आक्रमण के दौरान बर्तवाल बहादुरों ने आक्रमणकारियो को हराकर वहाँ से खदेड़ा था जिसके कारण उस क्षेत्र का नाम खदेड़ पट्टी पड़ा ।पूरे गढ़वाल क्षेत्र में केवल खदेड़ में ही गोरखे १० बरसों के अपने राज में कब्जा नहीं कर सके क्योकि बर्तवाल बीरों ने उनको हर बार बुरी तरह से पराजित किया। और आज इसी खदेड पट्टी से ये रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी और उत्तरकाशी और पौड़ी के कुछ क्षेत्रों में बस गए।


बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं
यह परमार राजवंश की एक उपशखा है जो बाद में अपभ्रंश होकर पंवार हो गई अपने प्रण को पूरा करने के विशेष गुण के फलत: इनको बर्त्वाल उपनाम से जाना जाने लगा जो कालांतर में इनकी प्रमुख जाति नाम हो गया, यानी परमार राजवंश के दो गुट हो गए थे. पंवार राजवंश और बर्त्वाल राजवंश.

क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही हैं
यह बात सामन्यत: देखीं जाती है की हम बर्त्वाल और बर्थवाल जाती को एक ही समझें की भूल किया करतें हैं उत्तराखंड के पौड़ी जिले मे रहने वाले बर्थवाल और बर्त्वाल जाती का आपस मे कोई तालमेल नहीं है पौड़ी मे जन्मे बर्थवाल जाती एक ब्राह्मण जाति है और बर्त्वाल एक ठाकुर यानी राजवंशी जाती है जिन्हे हम छत्रिय कहते हैं.कई बार लोग दोनो जातियों एक समझने लगते हैं.

यह किस कि पूजा /आराध्य करते हैं
बर्त्वालो की इस्ट देवी दक्षिण कलिंका भवानी है आज भी इनका मंदिर बर्त्वालो के प्रथम गांव रडुआ में है और कई जगह इनकी पूजा राजराजेश्वरी देवी के रूप में भी जाती हैं। बर्त्वाल लोग अपने नाम के आगे "ठाकुर" और नाम और जाति के बीच में "सिंह "का उपयोग होता है। इनका गोत्र भारद्वाज है। यह राजराजेश्वरी देवी के उपासक रहे है और इन्ही को अपनी ईस्ट यानी कुल देवी के रूप मे पूजते हैं 


 बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द
बर्त्वाल जाती हमेशा ही गढ़वाली भाषा का प्रयोग करती रही है है और आज भी उनके वंशज गढ़वाली भाषा का प्रयोग ही अपनी भाषा मे करते हैं लेकिन ये हार एक वंश मे होता है की कुछ शब्द थोड़ा अलग होते ही है तो इसमें बर्त्वालो के वंश में सबसे अलग यह है की ये अपने माता पिता को "जिया–बबाजी" या जिया–पिताजी",ससुर को "दीवान जी"और सास को "जी" कहकर बुलाते है,बर्त्वालो में "जदेसा" अभिवादन के रूप मे उपयोग किया जाता है,जो पहले गढ़वाल राजवंश के लोग भी किया करते थे।

 

 बर्त्वाल जाती के प्रसिद्ध व्यक्तियों पर एक लेख
  •  जसू बर्त्वाल और पंचमू बर्त्वाल
  •  भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल
  •  भीमसेन बर्तवाल
  •  ठाकुर धन सिंह बर्तवाल
  •  स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)
  •  चंद्र कुंवर बर्तवाल

जसू बर्त्वाल और पंचमू बर्त्वाल –ये दोनो ही प्रसिद्ध योगी रहे हैं इनका कई बार भैरव जागर, नरसिंग जगरो में इनका जिक्र आता है लेकिन इनके बारे में उपयुक्त जानकारी नहीं है।

भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल–ये दोनो भाई जिन्हे बर्तवाल बंधुओ के नाम से जाना जाता था वह राजा महिपति शाह के सेनापति थे जिन्होंने गढ़वाल की सीमा को दक्षिणी तिब्बत (दाबा गढ़)को विजित कर उस राज्य को राजा के अधीन कर वहा का प्रशासन संभाला। कुछ सालो बाद वहा दाबा के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। आज भी बर्त्वाल बंधुओ की तलवारे दाबा के थोलिंग मठ में विजय समारक के रूप में रखी हुई हैं जिनकी पूजा आज तक होती है।

भीमसेन बर्तवाल–ये मुगल दरबार में 1658–1678 ई० तक मनसबदार के पद पर नियुक्त थे,इनको 1000सवार और 600 जातियों का मनसब मिल रखा था बाद में इन्होंने मदन सिंह भंडारी ने मिल कर पंचभयाखाल में पांच भाई कठैतो को उनकी "कठैतगर्दी" के कारण खत्म किया ,इनको खत्म करने की योजना पुरिया नैथानी ने बनाई थी , भीमसेन की बहन महारानी बर्तवाली जो कि फतेहपति शाह की 7 साल तक संरक्षिका रही थी उस समय तक रानी बर्तवाली और रानी सिरमौरी ने ही गढ़वाल का शासन चलाया।

ठाकुर धन सिंह बर्तवाल–ये तल्ला नागपुर के सतेरा स्युपुरी गांव के मालगुजार हुआ करते थे।ये भगवान बद्रीनाथ के बड़े भक्त थे इनके द्वारा भगवान बद्रीनारायण की सुप्रसिद्ध आरती “पवन मंद सुगंध शीतल ” सन 1881 इ० में लिखी गई थी। इन्ही के गांव में और भी कई अन्य प्राचीन पांडुलिपी मिली है जिनमे गढ़वाल के राजवंश,आयुर्वेद,गढ़वाल के अन्य इतिहासो के बारे में जानकारी मिलती है

स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)–इनका जन्म 1885 में तल्ला नागपुर के चमस्वाड़ा गांव में हुआ था,ये जन्म से ही अंधे पैदा हुए थे इन्हें आधुनिक रुद्रप्रयाग का प्रणेता माना जाता है, इन्होंने रुद्रप्रयाग में 1944 में मिडिल स्कूल की स्थापना जो कि बाद में राजकीय इंटर कॉलेज, संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना, चिकित्सालय,पशु चिकित्सालय निर्माण, सुरंग निर्माण, गुलाबराय मैदान, धर्मशाला के निर्माण आदि जनसरोकारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर महाराज जी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

चंद्र कुंवर बर्तवाल–इनका जन्म 20 अगस्त 1919 में मालकोटी * पट्टी तल्ला नागपुर,रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड, भारत में हुआ था। ये हिंदी के कवि थे जिन्हे हिंदी का कालिदास भी कहा जाता है,प्रकृति के चितेरे कवि, हिमवंत पुत्र बर्त्वाल जी अपनी मात्र 28 साल की जीवन यात्रा में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा कर अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गये। 1947 में इनका आकस्मिक देहान्त हो गया।

इन्हों ने हिंदी में कई प्रसिद्ध रचनाएं की जैसे–
  1. नंदिनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  2. मेघकृपा / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल                            
  3. पयस्वनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  4. काफ़ल पाकू / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  5. रैमासी / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  6. हिमशृंग / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  7. मैकाले के खिलौने / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
  8. उस दिन के बादल / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल इत्यादि ।                         
    इसके अतिरिक्त गढ़वाल के प्रथम मानचित्रकार स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह बर्त्वाल, जिन्हें मानचित्र बनाने पर पुरुस्कार स्वरूप'गोल्ड मैडल' से पुरस्कृत किया गया परन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। एवं वर्तमान समय में चन्द्रकुंवर बर्त्वाल शोध संस्थान देहरादून के संस्थापक सचिव डाक्टर योगंबर सिंह बर्त्वाल जी अपने अथक प्रयास से पिछ्ले चालीस सालों से कविवर चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के व्यक्तिव एवं कृतित्व को उजागर करने के महायज्ञ में पूरे मनोयोग से तल्लीन हैं। कविवर को जनमानस के बीच जिंदा रखने का उनका भगीरथ प्रयास आज भी जारी है, जिसमें अब तक उन्होंने बारह लोगों को विषय पर पी एच डी करवाई, उत्तराखंड के विभिन्न स्थलों पर सात से अधिक कविवर की मूर्तियों को स्थापित किया एवं हिंदी विषय के पाठ्यक्रम में भी हिमवंत कवि की रचनाओं को समावेशित करने का अभूतपूर्व कार्य किया। उपर्युक्त सभी कर्मयोगी मनीषीयो से भावी पीढ़ी कुछ सीख ले कर प्रेरित होगी इसी ध्येय एवं विश्वास के साथ सबको सादर प्रणाम । 

1. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी
जी के पास 21 मंत्रालय व 24 विभाग है जो इस तरह से हैं 
मंत्रालय : कार्मिक एवं सतर्कता , सचिवालय प्रशासन , सामान्य प्रशासन , नियोजन , राज्यसंपत्ति , सूचना , गृह , राजस्व , औद्योगिक विकास खनन , औद्योगिक विकास , श्रम , सूचना प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान प्रौद्योगिकी , पेयजल , ऊर्जा , आयुष एवं आयुष शिक्षा , आबकारी , न्याय , पर्यावरण संरक्षण जलवायु परिवर्तन , आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास , नागरिक उड्डयन ।

 विभाग : कार्मिक एवं अखिल भारीतय सेवाओं का संस्थापना विषय कार्य , सतर्कता , सुराज , भ्रष्टाचार उन्मूलन एवं जनसेवा , सचिवालय प्रशासन , सामान्य प्रशासन , नियोजन , राज्य संपत्ति , सूचना , गृह , कारागार , नागरिक सुरक्षा एवं होमगार्ड , अर्द्ध सैनिक कल्याण , राजस्व , औद्योगिक विकास एवं खनन , औद्योगिक विकास , श्रम , सूचना प्रौद्योगिकी , विज्ञान प्रौद्योगिकी , पेयजल , ऊर्जा एवं वैकल्पिक ऊर्जा , आयुष , आबकारी , न्याय , पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन , आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास व नागरिक उड्डयन ।



2.सतपाल महाराज

 मंत्रालय : लोक निर्माण विभाग , पंचायती राज , ग्रामीण निर्माण , संस्कृति , धर्मस्व पर्यटन जलागम प्रबंधन , सिंचाई एवं लघु सिंचाई

 विभाग : लोक निर्माण विभाग , पंचायती राज , ग्रामीण निर्माण , संस्कृति , धर्मस्व , पर्यटन , जलागम प्रबंधन , भारत - नेपाल उत्तराखंड नदी परियोजनाएं , सिंचाई व लघु सिंचाई ।




3.प्रेमचंद अग्रवाल

मंत्रालय : वित्त , शहरी विकास , आवास , विधायी एवं संसदीय कार्य , पुनगर्ठन , जनगणना

 विभाग : वित्त , वाणिज्य , कर , स्टांप एवं निबंधन , शहरी विकास , आवास , विधायी एवं संसदीय कार्य , पुनर्गठन और जनगणना विभाग ।



4.गणेश जोशी

मंत्रालय : कृषि एवं कृषक कल्याण , सैनिक कल्याण व ग्राम्य विकास

विभाग : कृषि , कृषि शिक्षा , कृषि विपणन , उद्यान व कृषि प्रसंस्करण , उद्यान एवं फलोद्योग , रेशम विकास , जैव प्रौद्योगिकी , सैनिक कल्याण और ग्राम्य विकास



5.डॉ.धन सिंह रावत


मंत्रालय : विद्यालयी शिक्षा ( दोनों ) , संस्कृत शिक्षा , सहकारिता , उच्च शिक्षा , चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा ।

विभाग : विद्यालयी शिक्षा ( दोनों ) , संस्कृत शिक्षा , सहकारिता , उच्च शिक्षा , चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा



6.सुबोध उनियाल

मंत्रालय- वन मंत्रालय , भाषा , निर्वाचन एवं तकनीकी शिक्षा मंत्रालय

विभाग -वन विभाग , भाषा विभाग और निर्वाचन एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ।



7.सौरभ बहुगुणा

मंत्रालय : पशुपालन , दुग्ध विकास मत्स्य , गन्ना विकास चीनी उद्योग , प्रोटोकॉल , कौशल विकास एवं सेवायोजन

  विभाग : पशुपालन , दुग्ध विकास , मत्स्य पालन , गन्ना एवं चीनी उद्योग , प्रोटोकॉल , कौशल विकास व सेवायोजन ।



8.रेखा आर्य

 मंत्रालय : महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास , खाद्य , नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले , खेल युवा कल्याण

विभाग : खाद्य , महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास , नागरिक आपूर्ति व उपभोक्ता मामले , खेल युवा कल्याण ।


9.चंदन राम दास
 मंत्रालय : समाज कल्याण , अल्पसंख्यक कल्याण , परिवहन , लघु एवं सूक्ष्म , मध्यम उद्यम

 विभाग : समाज कल्याण , अल्पसंख्यक कल्याण , छात्र कल्याण , परिवहन , लघु सूक्ष्म एवं मध्यम उद्यम , खादी एवं ग्रामोद्योग ।


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बर्त्वाल  क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण 🙏

 
BARTWAL बर्त्वाल क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण

  • कौन होते है बर्त्वाल?
  • इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
  • बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं?
  • क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही?
  • यह  किस के उपासक /पूजा /आराध्य करते हैं
  • बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द
कौन होते है बर्त्वाल
उत्तराखंड मे काफ़ी सारी जातियाँ होती हैं उन्हीं जाती यानी कस्ट मे एक नाम आता है बर्त्वाल जाती का,बर्त्वाल एक पहाड़ी क्षत्रिय जाति है यह राजवंश मे इस लिए भी प्रमुख मानी जाती है क्यों की बर्त्वाल जाती के लोग काफ़ी साहसी निडर और निर्भीक होते थे इस लिए उत्तराखंड मे बर्त्वाल वंश से हार एक परिचत होगा

इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
  बर्त्वाल 9 शताब्दी ई० में धारानगरी–उज्जैन से आकर गढ़वाल में बस गए थे। इनका पहला गांव रडुवा–चंदनीखाल (उल्काखाल) जो गढ़वाल के इतिहास में बर्तगढ के नाम से जाना जाता था कालांतर में खदेड़ पट्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ, नेपाल के गोरखाली आक्रमण के दौरान बर्तवाल बहादुरों ने आक्रमणकारियो को हराकर वहाँ से खदेड़ा था जिसके कारण उस क्षेत्र का नाम खदेड़ पट्टी पड़ा ।पूरे गढ़वाल क्षेत्र में केवल खदेड़ में ही गोरखे १० बरसों के अपने राज में कब्जा नहीं कर सके क्योकि बर्तवाल बीरों ने उनको हर बार बुरी तरह से पराजित किया। और आज इसी खदेड पट्टी से ये रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी और उत्तरकाशी और पौड़ी के कुछ क्षेत्रों में बस गए।


बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं
यह परमार राजवंश की एक उपशखा है जो बाद में अपभ्रंश होकर पंवार हो गई अपने प्रण को पूरा करने के विशेष गुण के फलत: इनको बर्त्वाल उपनाम से जाना जाने लगा जो कालांतर में इनकी प्रमुख जाति नाम हो गया, यानी परमार राजवंश के दो गुट हो गए थे. पंवार राजवंश और बर्त्वाल राजवंश.

क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही हैं
यह बात सामन्यत: देखीं जाती है की हम बर्त्वाल और बर्थवाल जाती को एक ही समझें की भूल किया करतें हैं उत्तराखंड के पौड़ी जिले मे रहने वाले बर्थवाल और बर्त्वाल जाती का आपस मे कोई तालमेल नहीं है पौड़ी मे जन्मे बर्थवाल जाती एक ब्राह्मण जाति है  और बर्त्वाल एक ठाकुर यानी राजवंशी जाती है जिन्हे हम छत्रिय कहते हैं.कई बार लोग दोनो जातियों एक समझने लगते हैं.

यह  किस कि पूजा /आराध्य करते हैं
बर्त्वालो की इस्ट देवी दक्षिण कलिंका भवानी है आज भी इनका मंदिर बर्त्वालो के प्रथम गांव रडुआ में है और कई जगह इनकी पूजा राजराजेश्वरी देवी के रूप में भी जाती हैं। बर्त्वाल लोग अपने नाम के आगे "ठाकुर" और नाम और जाति के बीच में "सिंह "का उपयोग होता है। इनका गोत्र भारद्वाज है। यह राजराजेश्वरी देवी के उपासक रहे है और इन्ही को अपनी ईस्ट यानी कुल देवी के रूप मे पूजते हैं 


 बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द
बर्त्वाल जाती हमेशा ही गढ़वाली भाषा का प्रयोग करती रही है है और आज भी उनके वंशज गढ़वाली भाषा का प्रयोग ही अपनी भाषा मे करते हैं लेकिन ये हार एक वंश मे होता है की कुछ शब्द थोड़ा अलग होते ही है तो इसमें बर्त्वालो के वंश में सबसे अलग यह है की ये अपने माता पिता को "जिया–बबाजी" या जिया–पिताजी",ससुर को "दीवान जी"और सास को "जी" कहकर बुलाते है,बर्त्वालो में "जदेसा" अभिवादन  के रूप मे उपयोग किया जाता है,जो पहले गढ़वाल राजवंश के लोग भी किया करते थे।

 

 बर्त्वाल जाती के प्रसिद्ध व्यक्तियों पर एक लेख
  •  जसू बर्त्वाल और पंचमू  बर्त्वाल
  •  भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल
  •  भीमसेन बर्तवाल
  •  ठाकुर धन सिंह बर्तवाल
  •  स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)
  •  चंद्र कुंवर बर्तवाल

जसू बर्त्वाल और पंचमू  बर्त्वाल –ये दोनो ही प्रसिद्ध योगी रहे हैं इनका कई बार भैरव जागर, नरसिंग जगरो में इनका जिक्र आता है लेकिन इनके बारे में उपयुक्त जानकारी नहीं है।

भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल–ये दोनो भाई जिन्हे बर्तवाल बंधुओ के नाम से जाना जाता था वह राजा महिपति शाह के सेनापति थे  जिन्होंने गढ़वाल की सीमा को दक्षिणी तिब्बत (दाबा गढ़)को विजित कर उस राज्य को राजा के अधीन कर वहा का प्रशासन संभाला। कुछ सालो बाद वहा दाबा के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। आज भी बर्त्वाल बंधुओ की तलवारे दाबा के थोलिंग मठ में विजय समारक के रूप में रखी हुई हैं जिनकी  पूजा आज तक होती है।

भीमसेन बर्तवाल–ये मुगल दरबार में 1658–1678 ई० तक मनसबदार के पद पर नियुक्त थे,इनको 1000सवार और 600 जातियों का मनसब मिल रखा था बाद में इन्होंने मदन सिंह भंडारी ने मिल कर पंचभयाखाल में पांच भाई कठैतो को उनकी "कठैतगर्दी" के कारण खत्म किया ,इनको खत्म करने की योजना पुरिया नैथानी ने बनाई थी , भीमसेन की बहन महारानी बर्तवाली जो कि फतेहपति शाह की 7 साल तक  संरक्षिका रही थी उस समय तक रानी बर्तवाली और रानी सिरमौरी ने ही गढ़वाल का शासन चलाया।

ठाकुर धन सिंह बर्तवाल–ये तल्ला नागपुर के सतेरा स्युपुरी गांव के मालगुजार हुआ करते थे।ये भगवान बद्रीनाथ के बड़े भक्त थे इनके द्वारा भगवान बद्रीनारायण की सुप्रसिद्ध आरती “पवन मंद सुगंध शीतल ” सन 1881 इ० में लिखी गई थी। इन्ही के गांव में और भी कई अन्य प्राचीन पांडुलिपी मिली है जिनमे गढ़वाल के राजवंश,आयुर्वेद,गढ़वाल के अन्य इतिहासो के बारे में जानकारी मिलती है

स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)–इनका जन्म 1885 में तल्ला नागपुर के चमस्वाड़ा गांव में हुआ था,ये जन्म से ही अंधे पैदा हुए थे इन्हें आधुनिक रुद्रप्रयाग का प्रणेता माना जाता है, इन्होंने रुद्रप्रयाग में 1944 में मिडिल स्कूल की स्थापना जो कि बाद में राजकीय इंटर कॉलेज, संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना, चिकित्सालय,पशु चिकित्सालय निर्माण, सुरंग निर्माण, गुलाबराय मैदान, धर्मशाला के निर्माण आदि जनसरोकारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर महाराज जी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

चंद्र कुंवर बर्तवाल–इनका जन्म 20 अगस्त 1919 में मालकोटी * पट्टी तल्ला नागपुर,रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड, भारत में हुआ था। ये हिंदी के कवि थे जिन्हे हिंदी का कालिदास भी कहा जाता है,प्रकृति के चितेरे कवि, हिमवंत पुत्र बर्त्वाल जी अपनी मात्र 28 साल की जीवन यात्रा में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा कर अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गये। 1947 में इनका आकस्मिक देहान्त हो गया।
इन्हों ने हिंदी में कई प्रसिद्ध रचनाएं की जैसे–

नंदिनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
मेघकृपा / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल                            
पयस्वनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
काफ़ल पाकू / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
रैमासी / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
हिमशृंग / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
मैकाले के खिलौने / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
उस दिन के बादल / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल इत्यादि ।                         
    इसके अतिरिक्त गढ़वाल के प्रथम मानचित्रकार स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह बर्त्वाल, जिन्हें मानचित्र बनाने पर पुरुस्कार स्वरूप'गोल्ड मैडल' से पुरस्कृत किया गया परन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।                                                                                                                                                                             एवं वर्तमान समय में चन्द्रकुंवर बर्त्वाल शोध संस्थान देहरादून के संस्थापक सचिव डाक्टर योगंबर सिंह बर्त्वाल जी अपने अथक प्रयास से पिछ्ले चालीस सालों से कविवर चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के व्यक्तिव एवं कृतित्व को उजागर करने के महायज्ञ में पूरे मनोयोग से तल्लीन हैं। कविवर को जनमानस के बीच जिंदा रखने का उनका भगीरथ प्रयास आज भी जारी है, जिसमें अब तक उन्होंने बारह लोगों को विषय पर पी एच डी करवाई, उत्तराखंड के विभिन्न स्थलों पर सात से अधिक कविवर की मूर्तियों को स्थापित किया एवं हिंदी विषय के पाठ्यक्रम में भी हिमवंत कवि की रचनाओं को समावेशित करने का अभूतपूर्व कार्य किया।                                                                    उपर्युक्त सभी कर्मयोगी मनीषीयो से भावी पीढ़ी कुछ सीख ले कर प्रेरित होगी इसी ध्येय एवं विश्वास के साथ सबको सादर प्रणाम । 

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गढ़वाल रेजीमेन्ट 

अक्टूबर - नवम्बर 2012 रेजीमेंट ने अपनी स्थापना की 125 वीं ( 1887-2012 ) जयंती मनाई


गढ़वाल रेजीमेन्ट 5 मई , 1887 को तीसरी गोरखा रेजीमेन्ट की दूसरी बटालियन से अल्मोड़ा में गढ़वाली बटालियन का गठन हुआ । इसे तीसरी ( कुमाऊँ ) रेजीमेन्ट नाम दिया गया तथा इसे कालौंडांडा ( अब लैंसडौन ) में छावनी बनाने का काम सौंपा गया । सन् 1891 में 6 गढ़वाली कम्पनियों की मदद से 39 वीं ( गढ़वाली ) रेजीमेन्ट ) ऑफ बंगाल इन्फेन्ट्री का गठन किया गया , जिसने बर्मा में चीनियों के विरुद्ध अभूतपूर्व सफलता हासिल की । सन् 1892 में इसे राइफल का खिताब मिला । सन् 1901 में एक दूसरी बटालियन , 49 ( गढ़वाल राइफल्स ) रेजीमेन्ट ऑफ बंगाल इन्फेन्ट्री का गठन हुआ व बाद में इसका नामकरण सेकेण्ड बटालियन 39 गढ़वाल राइफल्स कर दिया गया । 2 फरवरी , 1921 में इसे रायल खिताब मिला व इसका नाम बदलकर 39 वीं रायल गढ़वाल राइफल्स हुआ । सन् 1922 में सैन्य पुनर्गठन के बाद इसका नाम 18 वीं रायल गढ़वाल राइफल्स हुआ व 1945 में इसे रायल गढ़वाल राइफल्स कहा जाने लगा । देश को स्वाधीनता मिलने उपरांत इसका नामकरण द गढ़वाल राइफल्स हुआ । अक्टूबर - नवम्बर 2012 रेजीमेंट ने अपनी स्थापना की 125 वीं ( 1887-2012 ) जयंती मनाई । इस अवसर पर रेजीमेंट पर डाक टिकट भी जारी किया गया ।



Garhwal Regiment

October - November 2012 The regiment celebrated its 125th (1887-2012) birth anniversary.

Garhwal Regiment On May 5, 1887, the Garhwali Battalion was formed at Almora from the 2nd Battalion of the 3rd Gorkha Regiment.  It was named the Third (Kumaon) Regiment and was entrusted with the task of building a cantonment at Kalaundanda (now Lansdowne).  In 1891, with the help of 6 Garhwali companies, the 39th (Garhwali) Regiment of Bengal Infantry was formed, which achieved unprecedented success against the Chinese in Burma.  In 1892 it got the title of rifle.  In 1901 a second battalion, 49 (Garhwal Rifles) Regiment of Bengal Infantry was formed and later it was renamed as Second Battalion 39 Garhwal Rifles.  It received the Royal title on 2 February 1921 and was renamed 39th Royal Garhwal Rifles.  After the military reorganization in 1922, it was named 18th Royal Garhwal Rifles and in 1945.It came to be called the Royal Garhwal Rifles.  After the country got independence, it was named The Garhwal Rifles.  October - November 2012 The regiment celebrated its 125th (1887-2012) birth anniversary.  A postage stamp on the regiment was also released on the occasion.
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बगड़ क्या होता है , उत्तराखंड के बगड़ो और उन पर बसे नगरों और जिलों के नाम।


बगड़ क्या होता है
बगड़ का शाब्दिक अर्थ " बहना" या " बह कर आया हुआ मलवा" से है । नदियों द्वारा बहाकर लाये गए जलोढ़ अवसाद जिसमे , मिट्टी , पत्तथर , पेड़ - पौधे , खनिज पदार्थ  ,सड़े- गले जीवाश्म को नदी अपने तल  से 500 से 1000 मीटर  ऊपर उठने पर इस अवसाद को एक स्थान पर एकत्र कर एक बड़े से मैदान का रूप  दे देती है । यह घटना प्रायः तब तब होती है जब नदी में जल की अधिकता अधिक होती है और नदी का मुहाना या तो संकरा हो या फिर नदी के मुहाने पर अवसाद (गाद) जमा हो जाये ,इससे बगड़ के बड़े मैदानों का निर्माण होता है।यह मैदान काफी उपजाऊ होते है और  वर्षो बाद इसमें इंसानी बस्तियों का बसना शुरू होता है , उदाहरण के लिए वर्ष  2013 की केदारनाथ आपदा के समय अलकनंदा नदी द्वारा श्रीनगर गढ़वाल में कुछ ऐसा ही दृश्य बनाया गया था।








उत्तराखंड के बगड़ और उन पर बसे नगर कहाँ पर स्थित हैं।

उत्तराखंड के बगड़ और उनके नाम

नारायण बगड़- कर्णप्रयाग
सिरोह बगड़-  कर्णप्रयाग- रुद्रप्रयाग मध्य
लामबगड़ - चमोली -जोशीमठ
 झूला बगड़-  कर्णप्रयाग
 खीरा बगड़ -  पौड़ी गढ़वाल
 देवली बगड़- पौड़ी 
चीला बगड़-  चमोली
 सरयू बगड़- बागेश्वर
 बेडु बगड़ - रुद्रप्रयाग
 बांजबगड़ - गोपेश्वर 
घाट बगड़ -चमोली -नंदप्रयाग
देवी बगड़ - नंदकोट कुमाऊं 
कालदू बगड़-  चमोली
सेरा बगड़ - गोपेश्वर
 केदार बगड़ - थराली



bgad kyaa hotaa hai , uttraakhnd ke bgado aur un pr bse nagaron aur jilon ke naam.


bgad kyaa hotaa hai
bgad kaa shaabdik arth " behna" yaa " beh kr aayaa huaa mlvaa" se hai . ndiyon dvaaraa bhaakr laaye gae jlorh avsaad jisme , mitti , pttthr , ped - paudhe , khnij pdaarth  ,sde- gale jivaashm ko ndi apne tal  se 500 se 1000 mitr  oopr uthne pr is avsaad ko ek sthaan pr ektr kr ek bde se maidaan kaa rup  de deti hai . yh ghtnaa praayah tb tb hoti hai jb ndi men jl ki adhiktaa adhik hoti hai aur ndi kaa muhaanaa yaa to snkraa ho yaa fir ndi ke muhaane pr avsaad (gaaad) jmaa ho jaaye ,isse bgad ke bde maidaanon kaa nirmaan hotaa hai.yh maidaan kaafi upjaaoo hote hai aur  vrso baad ismen insaani bstiyon kaa bsnaa shuru hotaa hai , udaahrn ke lie vrs  2013 ki kaarnaath aapdaa ke smy alknndaa ndi dvaaraa shringar garhvaal men kuchh aisaa hi drishy bnaayaa gayaa thaa.


uttraakhnd ke bgad aur unke naam

naaraayn bgade- krnpryaaga
siroh bgade-  krnpryaaga- rudrpryaaga mdhy
laambgade - chmoli -joshimth
 jhulaa bgade-  krnpryaaga
 khiraa bgad -  paudei gadhaal
 devli bgad- paudei
chilaa bgade-  chmoli
 sryu bgade- baagaeshvr
 bedu bgade - rudrpryaaga
 baanjbgad - gaopeshvr
ghaat bgade -chmoli -nndpryaaga
devi bgade - nndkot kumaaoon
kaaldu bgade-  chmoli
shera bgade - gaopeshvr
 kedaar bgade - thraali




UTTARAKHAND GK UPDATES

 आंचल अमृत योजना 
Aanchal Amrit Yojana

उत्तराखण्ड में 8 वीं कक्षा तक के छात्रों को स्कूल में सप्ताह में एक दिन मीठा दूध देने की योजना शुरू की गई है । इस योजना को ' आंचल अमृत योजना नाम दिया गया है । मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने 13 मार्च 2021को देहरादून में इस योजना की शुरुआत की ।

योजना के अन्तर्गत लगभग 7 लाख छात्रों तक दूध पहुंचाने का लक्ष्य है ।


  1. उत्तराखंड सरकार की योजना के तहत, सरकार 20,000 आंगनवाड़ी केंद्रों में 2.5 लाख बच्चों के लिए सप्ताह में 2 बार 100 मिलीलीटर दूध उपलब्ध कराएगी।
  2. प्रत्येक आंगनवाड़ी केंद्र में 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को आंचल अमृत योजना के तहत दूध उपलब्ध कराया जाएगा।
  3. मुख्यमंत्री आँचल अमृत योजना का प्राथमिक फोकस यह सुनिश्चित करना है कि राज्य में स्वस्थ बच्चे हैं और कुपोषण से दूर है।
  4. उत्तराखंड में कुपोषण से पीड़ित लगभग 18,000 बच्चे हैं, उन्हें संतुलित आहार प्रदान करके, स्वस्थ और स्वस्थ बच्चों के निर्माण और कुपोषण से निपटने में यह योजना काम आएगी।
  5. उत्तराखंड सरकार की इस सरकारी योजना के तहत, 20,000 आंगनवाड़ी केंद्रों को सुगंधित, मीठा और स्किम्ड मिल्क पाउडर उपलब्ध कराया जाएगा।
  6. प्रोटीन, कैल्शियम के एक स्रोत के रूप में दूध, विटामिन हड्डियों और दांतों के निर्माण और रखरखाव, तंत्रिका तंत्र के प्रदर्शन में सुधार, विकास में मदद, पाचन प्रक्रिया में सुधार, प्रतिरक्षा को बढ़ावा देने, निर्जलीकरण का इलाज करने और शरीर को ऊर्जा प्रदान करने जैसे लाभ प्रदान करता है
  7. इसमें बच्चों की पसंद को ध्यान में रखते हुए दूध को चाॅकलेटी, स्ट्राबेरी और वनीला फ्लेवर में तैयार किया गया है। जिसे राजकीय विद्यालय, सहायता प्राप्त विद्यालय और मदरसों में बांटा जायेगा।  प्राइमरी स्तर के बच्चों को 100 मिलीलीटर जबकि उच्च प्राइमरी के बच्चों को 150 मिली लीटर दूध दिया जायेगा।
  8.   दूध की आपूर्ति  उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड को दिया गया है। जहां से विद्यालयों को मांग व आवश्यकतानुसार दुग्ध के पैकेट प्रति तिमाही उपलब्ध किये जायेंगे।