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बर्त्वाल क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण 🙏
BARTWAL बर्त्वाल क्षत्रियों का संक्षेप में विश्लेषण
- कौन होते है बर्त्वाल?
- इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
- बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं?
- क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही?
- यह किस के उपासक /पूजा /आराध्य करते हैं
- बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द
कौन होते है बर्त्वाल
उत्तराखंड मे काफ़ी सारी जातियाँ होती हैं उन्हीं जाती यानी कस्ट मे एक नाम आता है बर्त्वाल जाती का,बर्त्वाल एक पहाड़ी क्षत्रिय जाति है यह राजवंश मे इस लिए भी प्रमुख मानी जाती है क्यों की बर्त्वाल जाती के लोग काफ़ी साहसी निडर और निर्भीक होते थे इस लिए उत्तराखंड मे बर्त्वाल वंश से हार एक परिचत होगा
इन्हें बर्त्वाल की संज्ञा क्यों प्रदान की गई है?
बर्त्वाल 9 शताब्दी ई० में धारानगरी–उज्जैन से आकर गढ़वाल में बस गए थे। इनका पहला गांव रडुवा–चंदनीखाल (उल्काखाल) जो गढ़वाल के इतिहास में बर्तगढ के नाम से जाना जाता था कालांतर में खदेड़ पट्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ, नेपाल के गोरखाली आक्रमण के दौरान बर्तवाल बहादुरों ने आक्रमणकारियो को हराकर वहाँ से खदेड़ा था जिसके कारण उस क्षेत्र का नाम खदेड़ पट्टी पड़ा ।पूरे गढ़वाल क्षेत्र में केवल खदेड़ में ही गोरखे १० बरसों के अपने राज में कब्जा नहीं कर सके क्योकि बर्तवाल बीरों ने उनको हर बार बुरी तरह से पराजित किया। और आज इसी खदेड पट्टी से ये रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी और उत्तरकाशी और पौड़ी के कुछ क्षेत्रों में बस गए।
बर्त्वाल किस राजवंश से सम्बन्ध रखते हैं
यह परमार राजवंश की एक उपशखा है जो बाद में अपभ्रंश होकर पंवार हो गई अपने प्रण को पूरा करने के विशेष गुण के फलत: इनको बर्त्वाल उपनाम से जाना जाने लगा जो कालांतर में इनकी प्रमुख जाति नाम हो गया, यानी परमार राजवंश के दो गुट हो गए थे. पंवार राजवंश और बर्त्वाल राजवंश.
क्या बर्त्वाल और बर्थवाल जाती एक ही हैं
यह बात सामन्यत: देखीं जाती है की हम बर्त्वाल और बर्थवाल जाती को एक ही समझें की भूल किया करतें हैं उत्तराखंड के पौड़ी जिले मे रहने वाले बर्थवाल और बर्त्वाल जाती का आपस मे कोई तालमेल नहीं है पौड़ी मे जन्मे बर्थवाल जाती एक ब्राह्मण जाति है और बर्त्वाल एक ठाकुर यानी राजवंशी जाती है जिन्हे हम छत्रिय कहते हैं.कई बार लोग दोनो जातियों एक समझने लगते हैं.
यह किस कि पूजा /आराध्य करते हैं
बर्त्वालो की इस्ट देवी दक्षिण कलिंका भवानी है आज भी इनका मंदिर बर्त्वालो के प्रथम गांव रडुआ में है और कई जगह इनकी पूजा राजराजेश्वरी देवी के रूप में भी जाती हैं। बर्त्वाल लोग अपने नाम के आगे "ठाकुर" और नाम और जाति के बीच में "सिंह "का उपयोग होता है। इनका गोत्र भारद्वाज है। यह राजराजेश्वरी देवी के उपासक रहे है और इन्ही को अपनी ईस्ट यानी कुल देवी के रूप मे पूजते हैं
बर्त्वाल जाती के आम बोलचाल से कुछ शब्द
बर्त्वाल जाती हमेशा ही गढ़वाली भाषा का प्रयोग करती रही है है और आज भी उनके वंशज गढ़वाली भाषा का प्रयोग ही अपनी भाषा मे करते हैं लेकिन ये हार एक वंश मे होता है की कुछ शब्द थोड़ा अलग होते ही है तो इसमें बर्त्वालो के वंश में सबसे अलग यह है की ये अपने माता पिता को "जिया–बबाजी" या जिया–पिताजी",ससुर को "दीवान जी"और सास को "जी" कहकर बुलाते है,बर्त्वालो में "जदेसा" अभिवादन के रूप मे उपयोग किया जाता है,जो पहले गढ़वाल राजवंश के लोग भी किया करते थे।
बर्त्वाल जाती के प्रसिद्ध व्यक्तियों पर एक लेख
- जसू बर्त्वाल और पंचमू बर्त्वाल
- भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल
- भीमसेन बर्तवाल
- ठाकुर धन सिंह बर्तवाल
- स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)
- चंद्र कुंवर बर्तवाल
जसू बर्त्वाल और पंचमू बर्त्वाल –ये दोनो ही प्रसिद्ध योगी रहे हैं इनका कई बार भैरव जागर, नरसिंग जगरो में इनका जिक्र आता है लेकिन इनके बारे में उपयुक्त जानकारी नहीं है।
भीम सिंह बर्त्वाल और उदय सिंह बर्त्वाल–ये दोनो भाई जिन्हे बर्तवाल बंधुओ के नाम से जाना जाता था वह राजा महिपति शाह के सेनापति थे जिन्होंने गढ़वाल की सीमा को दक्षिणी तिब्बत (दाबा गढ़)को विजित कर उस राज्य को राजा के अधीन कर वहा का प्रशासन संभाला। कुछ सालो बाद वहा दाबा के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। आज भी बर्त्वाल बंधुओ की तलवारे दाबा के थोलिंग मठ में विजय समारक के रूप में रखी हुई हैं जिनकी पूजा आज तक होती है।
भीमसेन बर्तवाल–ये मुगल दरबार में 1658–1678 ई० तक मनसबदार के पद पर नियुक्त थे,इनको 1000सवार और 600 जातियों का मनसब मिल रखा था बाद में इन्होंने मदन सिंह भंडारी ने मिल कर पंचभयाखाल में पांच भाई कठैतो को उनकी "कठैतगर्दी" के कारण खत्म किया ,इनको खत्म करने की योजना पुरिया नैथानी ने बनाई थी , भीमसेन की बहन महारानी बर्तवाली जो कि फतेहपति शाह की 7 साल तक संरक्षिका रही थी उस समय तक रानी बर्तवाली और रानी सिरमौरी ने ही गढ़वाल का शासन चलाया।
ठाकुर धन सिंह बर्तवाल–ये तल्ला नागपुर के सतेरा स्युपुरी गांव के मालगुजार हुआ करते थे।ये भगवान बद्रीनाथ के बड़े भक्त थे इनके द्वारा भगवान बद्रीनारायण की सुप्रसिद्ध आरती “पवन मंद सुगंध शीतल ” सन 1881 इ० में लिखी गई थी। इन्ही के गांव में और भी कई अन्य प्राचीन पांडुलिपी मिली है जिनमे गढ़वाल के राजवंश,आयुर्वेद,गढ़वाल के अन्य इतिहासो के बारे में जानकारी मिलती है
स्वामी सच्चिदानंद स्वामी(सज्जन सिंह बर्तवाल)–इनका जन्म 1885 में तल्ला नागपुर के चमस्वाड़ा गांव में हुआ था,ये जन्म से ही अंधे पैदा हुए थे इन्हें आधुनिक रुद्रप्रयाग का प्रणेता माना जाता है, इन्होंने रुद्रप्रयाग में 1944 में मिडिल स्कूल की स्थापना जो कि बाद में राजकीय इंटर कॉलेज, संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना, चिकित्सालय,पशु चिकित्सालय निर्माण, सुरंग निर्माण, गुलाबराय मैदान, धर्मशाला के निर्माण आदि जनसरोकारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर महाराज जी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
चंद्र कुंवर बर्तवाल–इनका जन्म 20 अगस्त 1919 में मालकोटी * पट्टी तल्ला नागपुर,रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड, भारत में हुआ था। ये हिंदी के कवि थे जिन्हे हिंदी का कालिदास भी कहा जाता है,प्रकृति के चितेरे कवि, हिमवंत पुत्र बर्त्वाल जी अपनी मात्र 28 साल की जीवन यात्रा में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा कर अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गये। 1947 में इनका आकस्मिक देहान्त हो गया।
इन्हों ने हिंदी में कई प्रसिद्ध रचनाएं की जैसे–
- नंदिनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
- मेघकृपा / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
- पयस्वनी/ चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
- काफ़ल पाकू / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
- रैमासी / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
- हिमशृंग / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
- मैकाले के खिलौने / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
- उस दिन के बादल / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल इत्यादि ।
इसके अतिरिक्त गढ़वाल के प्रथम मानचित्रकार स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह बर्त्वाल, जिन्हें मानचित्र बनाने पर पुरुस्कार स्वरूप'गोल्ड मैडल' से पुरस्कृत किया गया परन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। एवं वर्तमान समय में चन्द्रकुंवर बर्त्वाल शोध संस्थान देहरादून के संस्थापक सचिव डाक्टर योगंबर सिंह बर्त्वाल जी अपने अथक प्रयास से पिछ्ले चालीस सालों से कविवर चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के व्यक्तिव एवं कृतित्व को उजागर करने के महायज्ञ में पूरे मनोयोग से तल्लीन हैं। कविवर को जनमानस के बीच जिंदा रखने का उनका भगीरथ प्रयास आज भी जारी है, जिसमें अब तक उन्होंने बारह लोगों को विषय पर पी एच डी करवाई, उत्तराखंड के विभिन्न स्थलों पर सात से अधिक कविवर की मूर्तियों को स्थापित किया एवं हिंदी विषय के पाठ्यक्रम में भी हिमवंत कवि की रचनाओं को समावेशित करने का अभूतपूर्व कार्य किया। उपर्युक्त सभी कर्मयोगी मनीषीयो से भावी पीढ़ी कुछ सीख ले कर प्रेरित होगी इसी ध्येय एवं विश्वास के साथ सबको सादर प्रणाम ।





