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उत्तराखंड के प्रमुख मेले नोट्स प्रवीन
1-नंदादेवीमेला – भद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी से राज्य मे मनाया जाता है । कर्क तथा मकर सक्रांति पर नैनादेवी के मेले का आयोजन नैनीताल मे होता है
2- श्रावणी मेला – अल्मोड़ा के जगेश्वर धाम मे प्रतिवर्ष श्रावण मे के माह तक चलने वाला मेला मेला , महिलाए यह संतान प्राप्ति के लिए रात भर घी का दीपक हाथ मे थामे पुजा अर्चना करती है
3- सोमनाथ मेला – अल्मोड़ा के रानीखेत के पास रामगंगा के तट पर स्थित पालि – पछाऊँ छेत्र मासी मे वैशाख महीने मे अंतिम रविवार से सोमनाथ मेला शुरू होता है
4- गणनाथ मेला – अल्मोड़ा जिले मे गणनाथ मे प्रत्येक वर्ष कार्तिक पुर्णिमा को गणनाथ मेला मेले का आयोजन होता है ... इसमे स्त्रियाँ रात भर हाथ मे दीपक लेकर पुजा करने से निसंतान से पुत्र रंत्न की प्राप्ति करती है
5- स्याल्दे – बिखौती मेला – प्रतिवर्ष द्वारहाट अल्मोड़ा मे वैशाख महीने के पहले दिन बिखौती मेला व पहली रात्री को स्याल्दे मेला लगता है
6- श्री पूर्णागिरि मेला – चंपावत के टनकपुर के पास अन्नपूर्णा शिखर पर स्थित श्री पूर्णागिरि मंदिर मे चेत्र व अश्विन की नवरात्रो मे मेला लगता है श्री पूर्णागिरि देवी भगवती 108 सिद्धि पीठो मे मानी जाती है
7- बग्वाल मेला – चंपावत के माँ वाराहीदेवी (देविधुरा) मे रक्षाबंधन को श्रावणी पुर्णिमा को बग्वाल मेला लगता है.... स्थानीय लोग इसे असाड़ी कौतिक के नाम से जानते है ,इसमे बग्वाल खेलने वालों को ध्योक कहा जाता है
8- लड़ी धुरा मेला – यह चंपावत के बाराकोट मे पमदा के देवी मंदिर मे लगता है , मेले का आयोजन कार्तिक पुर्णिमा के दिन होता है
9- मानेश्वर मेला – चंपावत मे मयदेवी के पास मानेश्वर नामक चमत्कारी शीला के समीप इस मेले का आयोजन होता है । इस पत्थर का पूजन दुधारू पशु के स्वास्थ्य के लिए किया जाता है
10- थल मेला – पिथोरगढ़ के बालेश्वर मे थल मंदिर मे बैशाखी को यह मेला आयोजित होता है 13 अप्रैल 1940 को यहा बैशाखी के अवसर प्र जालियावाला बाग दिवस मनाए जाने के बाद इस मेले की शुरुआत हुई
11- जौल-जीवी मेला – पिथौरागढ़ के जौलजीवी काली और गोरी नदी के संगम प्र प्रतिवर्ष कार्तिक माह मे यह मेला आयोजित होता है इस मेले की शुरुआत 1914 मे मार्गशीष संक्रांति को हुई थी
12 – चैती या बालासुंदरी मेला – उधम शिंघ नगर के काशीपुर के पास स्थित कुंडेश्वरी देवी के मंदिर मे चैती मेले का आयोजन होता है , जो 10 दिन तक चलता है , देवी बालासुंदरी कुमाउ के चंद्र्वंशीय राजाओं की कुल देवी मानी जाती है
13- माघ मेला – उत्तरकाशी नगर मे माघ मेला लगता है , इस मे ग्रामवासी डोली उठा कर यहा लाते है
14- बिस्सू मेला – यह मेला उत्तरकाशी के गाउँ मे लगता है ... विषुवत संक्रांति के दिन लगने के कारण इस बिस्सू मेला कहा जाता है यह मेला धनुष-बाण से रोमांचकारी युद्ध के लिए प्रसिद्ध है
15- गिन्दीमेला – यह मेला पौड़ी गढ़वाल के ड़ाड़ामंडी मे मकरसंक्रांति के अवसर पर भाटपुडी देवी के मंदिर पर लगता है
16- बैकुंठ चतुर्दशी मेला – यह मेला पौडी के कमलेश्वर मंदिर श्रीनगर मे बैकुंठ चतुर्दशी को लगता है । कमलेश्वर मंदिर मे पति पत्नी रात भर हात मे घी का दीपक थामे संतान प्राप्ति हेतु पूजा करती है
17- दनगल मेला – यह मेला पौड़ी के सतपूली के पास दनगल के शिव मंदिर मे लगता है यह मंदिर गढ़वाल के प्रसिद्ध चार शक्तिपीठो मे से एक है
18- रणभूत कौथिक – टिहरी के नैलचामी पट्टी के ठेला ठेला गाव मे कार्तिक मास मे लगने वाला यह मेला राजशाही के समय विभिन्न युद्धो मे मरे लोगो के याद मे भूत नृत्य के रूप मे होता है
19- विकास मेला – टिहरी मे विकास मेला का आयोजन किया जाता है इसे विकास प्रदर्शनी के नाम से भी जाना जाता है
20- हरियाली पूड़ा मेला – चमोली कर्णप्रयाग के नोटी गाव मे चैत्र मास के पहले दिन हरियाली पूड़ा मेला लगता है नोटी गाव के लोग नन्दा देवी को धियाण्ण मानते है और उनकी पूजा अर्चना करते है
21 गोचर मेला –चमोली जिले के एतिहासिक एवं संकृतिक केंद्र गोचर मे लगने वाला यहा औधोयोगिक एवं विकास मेला 1943 मे गढ़वाल के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर बर्नेडी ने शुरू किया था , इसे पंडित जवाहर लाल नहरु के जन्मदिन पर शुरू किया गया था
22- नुणाई मेला – यह मेला देहारादून के जोनसार चकराता चेत्र के श्रावण माह मे लगता है इसे भेड़ – बकरियाँ को पालने वालों के नाम से भी जानते है... चरवाहे मीठारोट (शिव प्रसाद) को भगवान शीलगुरुजी को चढाते है और ... और इन का नाम ले कर वे अपनी भेड़ – बकरियाँ चरते है
23- टपकेशवर मेला – देहारादून के देवधारा नदी के किनारे एक गुफा मे स्थित भगवान शिव मंदिर की मान्यता दूर दूर तक है , इस गुफा मे शिवलिंग पर पानी की बूंदें खुद ही गिरती रहती है
24- भद्रराज देवता का मेला – देहारादून के मसूरी से 15 किमी दूर पहाड़ी पर यह मेला लगता है , भद्रराज एक प्राचीन मंदिर है जहा भक्तजन दूध चढ़ते है
25- झण्डा मेला – यह मेला देहारादून मे हर वर्ष चैत्र कृष्ण पंचमी को गुरु राम राय के जन्म दिन पर शुरू होता है , 1676 मे इसी दिन उनकी प्रतिष्टा मे एक बड़ा उत्सव मनाया गया था ... उस दिन से पंजाब के गुरु राम राय के भगतो का बड़ा समूह देहारादून तक पैदल चल कर आता है ... इस भक्त समूह को संगत कहते है
26- कुम्भ मेला – यह मेला हरिद्वार मे गंगा के तट पर प्रत्येक 12 वर्ष मे गुरु के कुम्भ राशि और सूर्य के मेष राशि पर स्थित होने पर लगता है , प्रत्येक 6 वर्ष मे अर्धकुंभ लगता है ,,,,
चीनी यात्री हवेनसांग इसे मोक्ष का पर्व कहते है
27- पिनार कलियर बाबा का उर्स मेला – यह हरिद्वार और रुड़की के मध्य कलियर गाव मे अगस्त माह मे आयोजीत होता है
28- उत्तरायणी मेला – मकर संक्रांति के अवसर पर कुमाऊँ – गढ़वाल छेत्र के कई नदी घाटो एवं मंदिरो पर उत्तरायणी मेला लगता है , सन 1921 मे वागेश्वर मे सरयू के किनारे इस मेले का आयोजन कुली बेगार कुप्रथा के समापन के संकल्प के लिए किया गया था
