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देहरादून का प्रसिद्ध झंडामेला ध्वजात्सव


झंडामेला ध्वजात्सव के नाम से मनाया




जाने वाला यह उत्सव गुरू रामराय द्वारा प्रवर्तित उदासी सम्प्रदाय के अनुयायी सिखों का धार्मिक उत्सव है। इसे पुराने देहरादून क्षेत्र को बसाने वाले गुरू रामराई (राय) के दरबार में मार्च के महिने में होलिकोत्सव से पूर्व आने वाली नवमी से लेकर इसके उपरान्त आने वाली नवमी तक मनाया जाता है। यद्यपि मुख्य उत्सव नियत रूप से होलिकोत्सव के बाद आने वाले कृष्णपक्ष की पंचमी को आयोजित किया जाता है जिसमें बहुत बड़ी संख्या में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमांचल प्रदेश आदि से उसके अनुयायी एकत्र होते हैं। कहा जाता है कि इस उत्सव का शुभारम्भ गुरुजी के जीवनकाल में ही हो गया था। एतदर्थ होली से पूर्व आने वाली नवमी तिथि को गुरु दरबार के महन्त अपने मनसदों एवं अनुयायियों को अम्बाला जिले के 'राईवाला' गांव से लाते थे। सम्प्रति इसका आयोजन उदासी सम्प्रदाय के वर्तमान महन्त के द्वारा किया जाता है। प्रथम महन्त हरप्रसाद, की नियुक्ति गुरु रामराई (राय) की पत्नी पंजाबकौर के द्वारा की गयी थी। अट्किंसन के अनुसार सत्रहवीं शताब्दि (1661) में अपने पिता गुरु हरराय की गद्दी को प्राप्त करने में असफल होने पर रामराय ने अपने भक्तों के साथ टौंस नदी के बांये तट पर स्थित कंडाली में अपना डेरा

डाला। बाद में उन्होंने देहरादून के खुड़बुड़ा नामक स्थान पर अपना डेहरा (डेरा) डाला। उसी समय औरंगजेब से प्राप्त एक संस्तुतिपत्र के आधार पर गढ़वाल के राजा फतेहशाह के द्वारा उन्हें यहां पर तीन गांवों (खुड़बुड़ा, राजपुरा, अमासूरी)) की जागीर दी गयी। कहा जाता है कि गुरु रामराय ने 1694 में यहां पर गुरुद्वारे की स्थापना करके झंडा फहराया था तभी से प्रतिवर्ष होली के छठे दिन यहां पर उसकी स्मृति में झंडोत्सव का आयोजन किया जाता है।

यह उत्सव 15 दिन का होता है। जिसमें 100 फीट के साल स्तम्भ में नवीन ध्वजा लगायी जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दौरान इस पर लाल, सुनहरी चुनरी (रेशमी वस्त्रखंड) बांधने से उनकी सारी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।



मेले की शुरूआत से पूर्व क्षेत्र के उदासियों के द्वारा दरबार के महन्त की अगुवाई में विशाल जुलूस का निकाला जाता है जिसमें सारे भक्तजन सम्मलित होते हैं। प्रति तीसरे वर्ष दरबार साहब के प्रांगण में स्थित पुराने ध्वजदण्ड के स्थान पर नागसिद्ध वन से काट कर लाये गये 50-60 फीट ऊंचे ध्वजदण्ड को आरोपित किया जाता है। झंडे की पूजा अर्चना के बाद पुराने झण्डे को उतारा जाता है तथा ध्वजदण्ड पर बांधे गये सभी वस्त्रखण्डों के आवरणों को उतार कर उस ध्वजदण्ड को दूध, दही व गंगाजल से पवित्र करके उसे नये वस्त्रों से आवृत किया जाता है। बाद में उस पर लाल रेशमी वस्त्र का आवरण चढ़ाया जाता है। उस पर पुनः गंगाजल चढ़ाया जाता है। इसके उपरान्त रस्सी की सहायता से ध्वजारोहण कराया जाता है।

यहां पर मुगल शैली की लाहोर में स्थित जहांगीर के मकबरे के प्रतिरूप की गुरु की समाधि है। माना जाता है कि इसे मुगल शासक औरंगजेब के आदेश से बनवाया गया था। इसके सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि औरंगजेब के दरबार में चमत्कार दिखाने के कारण उन्हें सिख गुरु परम्परा से वंचित कर दिये जाने के उपरान्त उन्होंने यहां आकर इसी दिन खुड़बुड़ा नामकइस स्थान पर होली के बाद पंचमी को ही अपना डेरा डाला था। इनके इस 'डेरे' के कारण ही दून (घाटी) का नाम डेरादून डेहरादून देहरादून पड़ा था। यह स्थान तत्कालिक गढ़वाल के शासक राजा फतेहशाह (1699-1749ई.) के द्वारा उन्हें डेरा स्थापित करने के लिए दिया गया था। फतेहशाह औरंगजेब के मित्र थे। इस डेरे की स्थापना के उपरान्त उनके अनेक अनुयायी पंजाब से यहां आकर रहने लगे थे।

अत्रस्थ रामराय दरबार साहिब के विषय में माना जाता है कि इस भवन का निर्माण 1707ई. में किया गया था। भवन भव्य है। इसके मुख्य प्रवेश द्वार एवं दीवारों को वनस्पतियों से तैयार किये गये रंगों से राजस्थानी, मुगलकालीन एवं पहाड़ी चित्रकारी शैली में सजाया गया है। रंग ऐसे हैं कि उनकी चमक अभी तक भी यथावत् बनी हुई है। गुरु जी की गद्दी व गद्दी के चारों ओर की चार रानियों की समाधियों व मीनारों पर व दीवारों पर की गयी चित्रकारी का रूप बड़ा आकर्षक व दर्शनीय है

उत्तराखंड में अंचल विवाह क्या है?

उत्तराखंड में अंचल विवाह क्या है?


अंचल विवाह:

मध्यकालीन उत्तराखंड में विवाह की वैधता
मध्यकालीन उत्तराखंड में, अंचल विवाह, विभिन्न प्रकार के वैवाहिक रूपों के बीच एक महत्वपूर्ण विवाह था। इसकी वैधता के लिए, "आंचल ग्रंथि" नामक एक अनिवार्य अनुष्ठान होता था।

आंचल ग्रंथि क्या था?


यह अनुष्ठान सप्तपदी के दौरान किया जाता था। वर और वधू के कंधों पर डाले गए वस्त्र खंडों (आंचल) के कोनों को गांठ लगाकर फेरे फेरे जाते थे।
आंचल ग्रंथि का महत्व और उसका विवाह की वैधता के संदर्भ में रोचक जानकारी प्रदान करता है। मध्यकाल में, विवाह की वैधता के लिए आंचल ग्रंथि का होना आवश्यक माना जाता था। इसका अर्थ था कि विवाह के अवसर पर वर और वधू के कन्धों पर आंचलों को लेकर गांठ लगाकर फेरे जाते थे। यह वैवाहिक अनुष्ठान का महत्वपूर्ण हिस्सा था और इसे सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था।

आंचल ग्रंथि क्यों महत्वपूर्ण था?


यह विवाह की सामाजिक और धार्मिक स्वीकृति का प्रतीक था। 'सरोल' या 'टके का व्याह' जैसे विवाहों में भी, जहां वर उपस्थित नहीं होता था, आंचल ग्रंथि अनिवार्य था। यह अनुष्ठान बाद में भी किया जा सकता था, लेकिन तब तक विवाह को पूर्ण नहीं माना जाता था।
आंचल ग्रंथि का अनुष्ठान विवाह की वैधता के लिए आवश्यक था, जो सप्तसदी के अवसर पर सम्पन्न होता था। इसके अलावा, विवाह के अन्य रूपों में भी आंचल ग्रंथि का उपयोग किया जाता था, जैसे कि 'सरोल' या 'टके का व्याह'। यह अनुष्ठान संबंधित व्यक्तियों के बीच समझौते को साक्ष्य करता था और उनके आचरण की धार्मिकता और सामाजिकता को प्रमाणित करता था।

आंचल ग्रंथि के महत्व के कुछ कारण:

यह विवाह की पवित्रता और गंभीरता को दर्शाता था।यह वर और वधू के बीच स्थायी बंधन का प्रतीक था।यह सामाजिक सम्मेलनों और रीति-रिवाजों के पालन का प्रमाण था।

आंचल ग्रंथि के अनुष्ठान से विवाह को वैध और प्रमाणित
आंचल ग्रंथि के अनुष्ठान के बिना, विवाह की वैधता प्राप्त नहीं होती थी। इसलिए, समाज में विवाह को वैध और प्रमाणित करने के लिए यह अनिवार्य था। आंचल ग्रंथि के माध्यम से, सामाजिक और धार्मिक नियमों का पालन किया जाता था और विवाह की प्रक्रिया को सम्पन्न किया जाता था।


आंचल ग्रंथि के बारे में कुछ रोचक तथ्य:


इसे "आंचल बंधन" या "आंचल फेरे" भी कहा जाता था।
यह अनुष्ठान आमतौर पर ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था।
गांठ को "मंगलसूत्र" का प्रतीक माना जाता था।
आंचल ग्रंथि के बाद, वर और वधू को पति-पत्नी माना जाता था।
आंचल ग्रंथि का अनुष्ठान विवाह की वैधता और समाज में विवाह की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इसे व्यावसायिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था, जिससे समाज की संरचना और समृद्धि में सहायक होता था।



निष्कर्ष:
अंचल विवाह, मध्यकालीन उत्तराखंड में विवाह का एक महत्वपूर्ण रूप था। आंचल ग्रंथि, इसकी वैधता के लिए एक अनिवार्य अनुष्ठान था। यह विवाह की पवित्रता, गंभीरता और स्थायी बंधन का प्रतीक था।

यह जानकारी आपको कैसी लगी? क्या आपके पास अंचल विवाह या आंचल ग्रंथि के बारे में कोई प्रश्न है?





अकितरि: उत्तराखंड के भेड़ पालकों का देवता




अकितरि उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र रवांई-जौनपुर तथा जौनसार-बावर के भेड़ - बकरी पालकों द्वारा बहुमान्य भेड़ों के रक्षक देवता जाख/श्रीगुल देवता / की देवयात्रा है। यह यात्रा वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को आयोजित की जाती है।

देवता का मूलस्थान


शिरगुल/श्रीकुल देवता का स्थान, जिसे उसका मूलस्थान भी माना जाता है, रवांई और बावर की सीमा पर जंगल के बीच जाख डांडे पर अवस्थित है। यहां पर देवदार की बड़ी-बड़ी बल्लियों से बना एक मंदिर है। मंदिर के शीर्ष के काष्ठ पर एक बकरी का बच्चा बनाया गया है जो अपनी मां का दूध पी रहा है।

यात्रा का क्रम


इस दिन बावर के भटाड़ गांव से देवता का डोला आता है। सायंकाल तक आसपास के गांवों के लोग ढोल, नगाड़े, तूरी, रणसिंगा आदि गाजे-बाजे के साथ देवता की पूजा आराधना के लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। भेड़ों की बलि चढ़ाई जाती है। अंधेरा होने पर आठ-नौ बजे के लगभग गाजों-बाजों के साथ देवता की पूजा की जाती है। धामी/डंगरियों/पस्वाओं में देवता का अवतरण व देवनृत्य होता है। नि:सन्तान महिलाएं देवता के सम्मुख रातभर हाथ जोड़कर सन्तानार्थ मनोतियाँ करती हैं। इनके पूरा होने पर दुबारा जाकर देवता को चढ़ावा चढ़ाती हैं। यात्री लोग मांस और भात का भोजन करके रात भर नाचते गाते रहते हैं और प्रातःकाल उजाला होने पर अपने घरों को जाते हैं।

अकितरि का महत्व


अकितरि मेषपालकों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह देवता भेड़ों - बकरियों की रक्षा करता है और उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखता है। अकितरि के दौरान मेषपालक अपने भेड़ों को देवता के दर्शन के लिए लाते हैं और उनकी पूजा करते हैं।

अकितरि की विशेषताएं


* यह एक प्राचीन त्योहार है जो सदियों से मनाया जाता रहा है।
* यह त्योहार मेषपालकों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
* यह त्योहार देवता के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।
* यह त्योहार सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी प्रतीक है।

निष्कर्ष


अकितरि उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार मेषपालकों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और देवता के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। यह त्योहार सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी प्रतीक है।




UTTARAKHAND GK UPDATES

लोसर क्या है और यह किस जनजाति से सम्बंधित है ?

तिब्बती जनजातिय बौद्ध परंपराओं के अनुसार नववर्ष को लोसर उत्सव मानते है ।यह उत्सव मूलतः तिब्बत के लामा लोगों का उत्सव है । 1962 में तिब्बत को चीन द्वारा अधिकृत किए जाने के बाद वहां के प्रवासी खम्पा लोगों ने उत्तराखंड के

कुमाऊँ क्षेत्र में पिथौरागढ़ जनपद के   दारमा ,बेरीनाग, धारचूला आदि क्षेत्रों में तथा गढ़वाल के उत्तरकाशी जनपद के डुंडा आदि क्षेत्रों में प्रवास के बाद उन्हें यहां पर भी यह उत्सव मनाना शुरू किया ।
           
तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार नया वर्ष अर्थात लोसर का उत्सव लद्दाख ,लाहौल, स्पीति ,किन्नौर आदि में 25 दिसंबर के आसपास यह उत्सव मनाया जाता है किंतु उत्तराखंड में प्रवासी तिब्बती लोग इसे तिब्बती पंचांग के अनुसार 20 फरवरी के आसपास चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की को मनाते हैं ,इसे 5 दिन तक मनाया जाता है जिसमें सामूहिक रूप से प्रार्थना की जाती हैं, इस दिन परिवार के सभी सदस्य प्रात काल उठकर अपने परिवार के साथ अपने वरिष्ठ सदस्यों के पास  जाकर अपने तिब्बती ढंग में उन्हें नमस्कार करते हैं तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं


ये घरों की छतों पर अपने कुल देवता का नाम लाल या सफेद ध्वज लहरा कर करते हैं जिन्हें तिब्बती भाषा में दरचोक  या दारचौक कहा जाता है, इस दिन इनका पसंदीदा भोज्य पदार्थ थोक्या(थोपा) और मोमो बनाया जाता है

 इसके अतिरिक्त घर के बाहरी प्रकृति में एक डोर में  लाल ,पीले, हरे नीले व सफेद 5 रंगों की पता  सजाई जाती हैं जिन्हें "लुगदा" कहा जाता है ,इसमें नीला आकाश का सफेद बादल का हरा वनस्पति का प्रतिनिधित्व करता है।

 


दारचौक लगाने से पूर्व लामाओं द्वारा तांत्रिक विधि से इसका अभियंत्रण एवं पूजन किया जाता है परिवार में के कुशल- मंगल की  एवं दुष्ट शक्तियों के परिहार के लिए कुल देवता की पूजा आराधना की जाती है फिर इस पताका को प्रकृति में लगाया जाता है । कई स्थानों पर यह पताका 1 से 5 किलो मीटर तक बाँधी हुई देखी जा सकती है यह बुरी शक्तियों के प्रभाव को कम करने के लिए उस स्थान पर अभियंत्रण कर के लगी जाती है
यह उत्सव सामान्य तो 3 से 5 दिनों का होता है किंतु विशेष परिस्थितियों में ही 3 दिन भी किया जाता है
 
 
UTTARAKHAND GK UPDATES

losr kyaa hai aur yh kis jnjaati se smbndhit hai ?

tibbti jnjaatiy bauddh prnpraaon kanusaar nvvrs ko losr utsv maante hai .yh utsv multah tibbt ke laamaa logaon kaa utsv hai . 1962 men tibbt ko chin dvaaraa adhikrit kie jaane ke baad vhaan ke prvaasi khmpaa logaon ne uttraakhnd ke

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 iskatirikt ghr ke baahri prkriti men ek dor men  laal ,pile, hre nile v sfed 5 rngaon ki ptaa  sjaaee jaati hain jinhen "lugadaa" khaa jaataa hai ,ismen nilaa aakaash kaa sfed baadl kaa hraa vnspti kaa prtinidhitv krtaa hai.

 


daarchauk lgaaane se purv laamaaon dvaaraa taantrik vidhi se iskaa abhiyntrn evn pujn kiyaa jaataa hai privaar men ke kushl- mngal ki  evn dust shktiyon ke prihaar ke lie kul devtaa ki pujaa aaraadhnaa ki jaati hai fir is ptaakaa ko prkriti men lgaaayaa jaataa hai . kee sthaanon pr yh ptaakaa 1 se 5 kilo mitr tk baandhi huee dekhi jaa skti hai yh buri shktiyon ke prbhaav ko km krne ke lie us sthaan pr abhiyntrn kr ke lgai jaati hai
yh utsv saamaany to 3 se 5 dinon kaa hotaa hai kintu vishes pristhitiyon men hi 3 din bhi kiyaa jaataa hai






   

उत्तराखंड जीके अपडेट्स
विषय - सूची 
1. उत्तराखण्ड राज्य के सभी प्रतीक चिन्ह 
2 उत्तराखण्ड राज्य के सभी जनपदों का क्रमबद्ध अध्ययन
 3. उत्तराखण्ड के सभी मंदिरों एवं चार धामों का अध्ययन 
4. उत्तराखण्ड का भूगोल , भौगोलिक संरचना एवं सीमाओं का अध्ययन
 5. उत्तराखण्ड में वन सम्पदा , कृषि , पशुपालन एवं उद्योग 
6. उत्तराखण्ड में राजनैतिक प्रशासन , राज्य का गठन एवं राज्य के महत्वपूर्ण पदाधिकारी 
7. उत्तराखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था नगरपालिकाओं वर्णन 
8. उत्तराखण्ड लोक कला संस्कृति एवं फिल्म जगत साहित्य
 9. उत्तराखण्ड सरकार की सम्पूर्ण योजनाओं का अध्ययन
 10. उत्तराखण्ड के खेल खिलाड़ी एव पुरस्कार
 11. उत्तराखण्ड राज्य की महत्वपूर्ण विभूतियां 
12 उत्तराखण्ड में शिक्षा , साहित्य पर्यावरण वैज्ञानिक राजनैतिक व्यक्ति 
13. राज्य प्रथम व्यक्ति एवं प्रथम महिलाएं 
14. उत्तराखण्ड में व्यक्तियों के उपनाम व उपाधियां एवं उनके क्षेत्र 
15. उत्तराखण्ड के शहरों के प्राचीन नाम प्रमुख संस्थाएं एवं उनके सस्थापक
 16. उत्तराखण्ड की प्रमुख पुस्तकें एवं उनके लेखक 
17. उत्तराखण्ड राज्य सम्बन्धित महत्वपूर्ण आँकड़ों का अध्ययन 

उत्तराखण्ड का इतिहास 

1. उत्तराखण्ड इतिहास से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य
 2 उत्तराखण्ड में पुरा प्रजातियों का वर्णन एवं गढ़वाल एवं कुमाऊँ क्षेत्र 
3. उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल , आद्य ऐतिहासिक काल एवं ऐतिहासिक काल वर्णन
 4. उत्तराखण्ड के सभी राजवंश कार्तिकेयपुर , चंद वश , परमार वंश का वर्णन 
5. उत्तराखण्ड में गोरखा प्रशासन , ब्रिटिश प्रशासन , वन प्रबन्धन तथा भूमि बन्दोबस्त
 6. उत्तराखण्ड में मुस्लिम शासकों आगमन एवं उनके सम्बन्ध
 7. उत्तराखण्ड में पत्रकारिता का विकास एवं आधुनिक पत्र पत्रिकाएं 
8. उत्तराखण्ड में स्वतन्त्रता संग्राम एवं महिलाओं की भूमिका 
9. उत्तराखण्ड में प्रसिद्ध वन आन्दोलन एवं राजनैतिक आन्दोलन 
10 उत्तराखण्ड की जनजातियाँ- थारू , जौनसारी , भोटिया , बोक्सा , राजी , बुक्सा जनजाति 
11. उत्तराखण्ड से सम्बन्धित अन्य महत्वपूर्ण सामान्य जानकारी 
12. उत्तराखण्ड विविध जानकारी

Uttarakhand GK Updates

 subject list

 1. All the symbols of Uttarakhand state

 2 systematic study of all the districts of Uttarakhand state

 3. Study of all the temples and Char Dhams of Uttarakhand

 4. Geography of Uttarakhand, study of geographical structure and boundaries

 5. Forest wealth, agriculture, animal husbandry and industry in Uttarakhand

 6. Political administration, formation of the state and important officials of the state in Uttarakhand

 7. Description of Panchayati Raj System and Municipalities in Uttarakhand

 8. Uttarakhand Folk Art Culture and Film Literature

 9. Study of the complete schemes of the Government of Uttarakhand

 10. Sports Players and Awards of Uttarakhand

 11. Important Celebrities of Uttarakhand State

 12 Education, Literature, Environmental Scientist Political Person in Uttarakhand

 13. State First Person and First Ladies

 14. Surnames and titles of persons in Uttarakhand and their regions

 15. Ancient names of cities of Uttarakhand, major institutions and their founders

 16. Major Books of Uttarakhand and their Authors

 17. Study of important data related to Uttarakhand state


 History of Uttarakhand


 1. Important facts related to Uttarakhand History

 2 Description of Pura species in Uttarakhand and Garhwal and Kumaon region

 3. Prehistoric period, Proto-historic period and Historical period description of Uttarakhand

 4. Description of all the dynasties of Uttarakhand, Kartikeyapur, Chand Vash, Parmar dynasty

 5. Gorkha Administration, British Administration, Forest Management and Land Settlement in Uttarakhand

 6. Arrival of Muslim rulers in Uttarakhand and their relations

 7. Development of Journalism and Modern Journals in Uttarakhand

 8. Freedom Struggle and Role of Women in Uttarakhand

 9. Famous Forest Movement and Political Movement in Uttarakhand

 10 Tribes of Uttarakhand - Tharu, Jaunsari, Bhotia, Boxa, Raji, Buxa tribe

 11. Other important general information related to Uttarakhand

 12. Uttarakhand Miscellaneous Information

जौनसारी यह उत्तराखंड राज्य का दूसरा सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है लेकिन गढ़वाल क्षेत्र का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है प्रजातियां दृष्टि से यह इंडोआर्यन परिवार के हैं
इनका मुख्य निवास स्थान लघु हिमालय के उत्तर पश्चिमी भाग का भाबर क्षेत्र के अंतर्गत देहरादून का चकराता, कालसी त्योनी, लाखामंडल आदि क्षेत्र व टिहरी का जौनपुर क्षेत्र तथा उत्तरकाशी का परग नेकाना क्षेत्र आता है

 देहरादून का कालसी चकराता व त्यूणी तहसील को जौनसार बावर क्षेत्र कहा जाता है जौनसार क्षेत्र में कुल 39पट्टी  हैं वह 358 राजस्व गांव है

 जौनसार बावर क्षेत्र की मुख्य भाषा जौनसारी है , बावर क्षेत्र में बावरी भाषा,  देवघार में देवघारी और हिमाचली भाषा में भी बोली जाती है, लेकिन पढ़ने लिखने  में केवल हिंदी का प्रयोग करते हैं ।

 यह मंगोल एवं डोमो की मिश्रित लक्षण वाले होते  हैं इनको3 जनजाति ख़सास , कारीगर और हरिजन  वर्गों में विभाजित किया गया है ख़ासास में ब्राह्मण और राजपूत, कारीगर वर्ग में लोहार ,सुनार ,बढ़ाई  और हरिजन वर्ग में डोम , कोल्टा, कोली ,मोची आदि जातियां आती हैं

 इनकी वेशभूषा में पुरुषों को सर्दियों में ऊनि कोट, ऊनी पजामा ,ऊनि टोपी डीगुबा पहनते हैं  गर्मियों में इनके चूड़ीदार पैजामा बंद गले का कोट व सूती टोपी पहनी जाती हैं वस्तु तथा स्त्रियां सूती घाघरा और कुर्ती समीज पहनती है और कुर्ते के बाहर चोली पहनती हैं वह अन्य चीजों से निर्मित रंग-बिरंगे जूते पहनते हैं 


 सर्दियों में स्त्रियां ऊनी कुर्ता ,ऊनी  घाघरा  और एक बड़ा सा डाट रुमाल पहनती हैं और गर्मियों में ये सूती घाघरा, कुर्ती कमीज पहनती हैं  और कुर्ते के बाहर एक चोली जिसे चोलटी कहते हैं ये ऊनि  चीजों से निर्मित रंग-बिरंगे आल
 जूते पहनते है।  

  • नोट....आधुनिकता के तौर पर पेंट कोट तथा साड़ी ब्लाउज का प्रचलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है 

  • आवास  की बात की जाए  तो इनके घर लकड़ी और पत्थर से बने हुए होते हैं जो 3 4 मंजिला होते हैं और घर का प्रमुख  द्वार लकड़ियों से बना होता है जिस पर विभिन्न प्रकार की  नक्काशी की जाती है।