देहरादून का प्रसिद्ध झंडामेला ध्वजात्सव
झंडामेला ध्वजात्सव के नाम से मनाया
जाने वाला यह उत्सव गुरू रामराय द्वारा प्रवर्तित उदासी सम्प्रदाय के अनुयायी सिखों का धार्मिक उत्सव है। इसे पुराने देहरादून क्षेत्र को बसाने वाले गुरू रामराई (राय) के दरबार में मार्च के महिने में होलिकोत्सव से पूर्व आने वाली नवमी से लेकर इसके उपरान्त आने वाली नवमी तक मनाया जाता है। यद्यपि मुख्य उत्सव नियत रूप से होलिकोत्सव के बाद आने वाले कृष्णपक्ष की पंचमी को आयोजित किया जाता है जिसमें बहुत बड़ी संख्या में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमांचल प्रदेश आदि से उसके अनुयायी एकत्र होते हैं। कहा जाता है कि इस उत्सव का शुभारम्भ गुरुजी के जीवनकाल में ही हो गया था। एतदर्थ होली से पूर्व आने वाली नवमी तिथि को गुरु दरबार के महन्त अपने मनसदों एवं अनुयायियों को अम्बाला जिले के 'राईवाला' गांव से लाते थे। सम्प्रति इसका आयोजन उदासी सम्प्रदाय के वर्तमान महन्त के द्वारा किया जाता है। प्रथम महन्त हरप्रसाद, की नियुक्ति गुरु रामराई (राय) की पत्नी पंजाबकौर के द्वारा की गयी थी। अट्किंसन के अनुसार सत्रहवीं शताब्दि (1661) में अपने पिता गुरु हरराय की गद्दी को प्राप्त करने में असफल होने पर रामराय ने अपने भक्तों के साथ टौंस नदी के बांये तट पर स्थित कंडाली में अपना डेरा
डाला। बाद में उन्होंने देहरादून के खुड़बुड़ा नामक स्थान पर अपना डेहरा (डेरा) डाला। उसी समय औरंगजेब से प्राप्त एक संस्तुतिपत्र के आधार पर गढ़वाल के राजा फतेहशाह के द्वारा उन्हें यहां पर तीन गांवों (खुड़बुड़ा, राजपुरा, अमासूरी)) की जागीर दी गयी। कहा जाता है कि गुरु रामराय ने 1694 में यहां पर गुरुद्वारे की स्थापना करके झंडा फहराया था तभी से प्रतिवर्ष होली के छठे दिन यहां पर उसकी स्मृति में झंडोत्सव का आयोजन किया जाता है।
यह उत्सव 15 दिन का होता है। जिसमें 100 फीट के साल स्तम्भ में नवीन ध्वजा लगायी जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दौरान इस पर लाल, सुनहरी चुनरी (रेशमी वस्त्रखंड) बांधने से उनकी सारी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
मेले की शुरूआत से पूर्व क्षेत्र के उदासियों के द्वारा दरबार के महन्त की अगुवाई में विशाल जुलूस का निकाला जाता है जिसमें सारे भक्तजन सम्मलित होते हैं। प्रति तीसरे वर्ष दरबार साहब के प्रांगण में स्थित पुराने ध्वजदण्ड के स्थान पर नागसिद्ध वन से काट कर लाये गये 50-60 फीट ऊंचे ध्वजदण्ड को आरोपित किया जाता है। झंडे की पूजा अर्चना के बाद पुराने झण्डे को उतारा जाता है तथा ध्वजदण्ड पर बांधे गये सभी वस्त्रखण्डों के आवरणों को उतार कर उस ध्वजदण्ड को दूध, दही व गंगाजल से पवित्र करके उसे नये वस्त्रों से आवृत किया जाता है। बाद में उस पर लाल रेशमी वस्त्र का आवरण चढ़ाया जाता है। उस पर पुनः गंगाजल चढ़ाया जाता है। इसके उपरान्त रस्सी की सहायता से ध्वजारोहण कराया जाता है।
यहां पर मुगल शैली की लाहोर में स्थित जहांगीर के मकबरे के प्रतिरूप की गुरु की समाधि है। माना जाता है कि इसे मुगल शासक औरंगजेब के आदेश से बनवाया गया था। इसके सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि औरंगजेब के दरबार में चमत्कार दिखाने के कारण उन्हें सिख गुरु परम्परा से वंचित कर दिये जाने के उपरान्त उन्होंने यहां आकर इसी दिन खुड़बुड़ा नामकइस स्थान पर होली के बाद पंचमी को ही अपना डेरा डाला था। इनके इस 'डेरे' के कारण ही दून (घाटी) का नाम डेरादून डेहरादून देहरादून पड़ा था। यह स्थान तत्कालिक गढ़वाल के शासक राजा फतेहशाह (1699-1749ई.) के द्वारा उन्हें डेरा स्थापित करने के लिए दिया गया था। फतेहशाह औरंगजेब के मित्र थे। इस डेरे की स्थापना के उपरान्त उनके अनेक अनुयायी पंजाब से यहां आकर रहने लगे थे।
अत्रस्थ रामराय दरबार साहिब के विषय में माना जाता है कि इस भवन का निर्माण 1707ई. में किया गया था। भवन भव्य है। इसके मुख्य प्रवेश द्वार एवं दीवारों को वनस्पतियों से तैयार किये गये रंगों से राजस्थानी, मुगलकालीन एवं पहाड़ी चित्रकारी शैली में सजाया गया है। रंग ऐसे हैं कि उनकी चमक अभी तक भी यथावत् बनी हुई है। गुरु जी की गद्दी व गद्दी के चारों ओर की चार रानियों की समाधियों व मीनारों पर व दीवारों पर की गयी चित्रकारी का रूप बड़ा आकर्षक व दर्शनीय है






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